बुलंद सोच, इंदौर।
हरित कार्यकर्ता और हिमालयन पर्यावरण अध्ययन और संरक्षण संगठन के संस्थापक पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने कहा है कि पहाड़ी राज्यों में बढ़ती पर्यटकों की संख्या को नियंत्रित करना आवश्यक है। उन्होंने इस बात पर भी ध्यान देने को कहा कि स्थानीय आय भी प्रभावित न हो। डॉ. जोशी ने यह बात नईदुनिया से चर्चा के दौरान कही, जिसके बाद वे सेवा सुरभि द्वारा आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुए।
डॉ. जोशी के अनुसार, बढ़ती पर्यटकों की संख्या के कारण पहाड़ों में कचरा भी बढ़ रहा है। ऐसे में जहां से पर्यटकों की एंट्री होती है, वहीं पर यह तय किया जाए कि पहाड़ों पर क्या ले जाया जा सकता है।
इसके साथ ही उन्होंने पहाड़ों पर वाहनों की एंट्री को भी रोकने की बात कही, क्योंकि कारों से कई स्थानों पर ब्लैक कार्बन बनता है। यह ब्लैक कार्बन हिमालय के ग्लेशियर में जम जाता है, जिससे उनके गलने की गति बढ़ जाती है।
डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने कहा कि पहाड़ों पर पानी की बोतलों की एंट्री बंद करना होगी। उन्होंने प्रयास करने को कहा कि पर्यटक स्थानीय पानी पिएं और स्थानीय भोजन खाएं। साथ ही, कारों की संख्या पर भी नियंत्रण करना होगा।
इसके लिए राज्य सरकार को पहाड़ों पर जाने के लिए बसें चलाना चाहिए। पर्यटकों को बसों से ही भेजा जाए, जिससे पर्यटकों की संख्या तय रहेगी और व्यवस्थाएं भी सरकार के नियंत्रण में होंगी।
कान्ह नदी पर ध्यान
इंदौर में प्रदूषित हो चुकी कान्ह नदी को लेकर डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने कहा कि इंदौरवासियों को इसे एक चुनौती के रूप में लेना होगा। उन्होंने बताया कि इंदौर के लोग पर्यावरण के प्रति जागरूक हैं और वे इस दिशा में भी कार्य कर सकते हैं।
डॉ. जोशी ने कहा कि नदी को जीवित रखने का एक ही तरीका है कि उसमें अधिक से अधिक पानी का बहाव हो। साथ ही, पानी के बहाव को बढ़ाने के लिए प्रकृति को समझना भी आवश्यक है। वर्षाकाल इसके लिए उपयुक्त समय हो सकता है, जब वर्षा का पानी नदी के चारों ओर जलछिद्र में भरेगा तो पानी बढ़ेगा।
वृक्षारोपण और जीवन दर
डॉ. अनिल प्रकाश जोशी के अनुसार, पेड़ों को भी पानी की आवश्यकता है, यही कारण है कि इन्हें वर्षा में रोपा जाता है। उन्होंने यह भी ध्यान देने को कहा कि जो पेड़ लगाए जा रहे हैं, वे स्थानीय मिट्टी के उपयुक्त हों।
उन्होंने बताया कि कई बार पेड़ों को ट्रांसप्लांट भी किया जाता है, लेकिन इनका सर्वाइवल रेट सिर्फ 25 प्रतिशत ही है। इसका कारण यह है कि इन्हें एक मिट्टी से निकालकर दूसरी प्रकार की मिट्टी में रोपा जाता है। उन्होंने ट्रांस्प्लांटेशन के नए तरीकों के गहरे अध्ययन की जरूरत बताई।
मध्य प्रदेश में श्रीराम वन गमन पथ का विस्तार
मध्य प्रदेश में श्रीराम वन गमन पथ में 10 और स्थल जोड़े जाएंगे। इसके साथ ही अब श्रद्धालु 25 की जगह 35 तीर्थों के दर्शन कर सकेंगे।

