बुलंद सोच, पन्ना।

पन्ना में सड़क किनारे दो मासूम बच्चे सपेरा बनकर जीविका चलाते देखे गए। तस्वीर में एक बच्चे के सामने टोकरी में काला नाग रखा था, जिसे वह हाथों से संभाल रहा था। दूसरा छोटा बच्चा पीछे खड़ा होकर देख रहा था।
शासन द्वारा शिक्षा के अधिकार के तहत अनेक योजनाएँ संचालित होने के बावजूद, गरीब और मजदूर परिवारों के ये बच्चे अपनी और परिवार की दो वक्त की रोटी के लिए जान जोखिम में डालकर सपेरागिरी कर रहे हैं। इन बच्चों के सिर पर छत नहीं है, पैरों में चप्पल नहीं है, तन पर मैले-कुचैले कपड़े हैं और उनके हाथ में खतरनाक सांप की टोकरी है।
लोगों का कहना है कि वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत सांपों को पकड़ना और उनका प्रदर्शन करना दंडनीय अपराध है। साथ ही, 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से मजदूरी करवाना बाल श्रम कानून का भी उल्लंघन है।
यह सवाल उठता है कि क्या शासन की तमाम योजनाओं के बावजूद ये परिवार इतने मजबूर हैं कि इन्हें अपने बच्चों से इस तरह का काम करवाना पड़ रहा है। क्या बाल कल्याण विभाग और महिला एवं बाल विकास विभाग इन बच्चों तक नहीं पहुंच पा रहा है।
समाजसेवियों और क्षेत्रवासियों ने प्रशासन से मांग की है कि इन बच्चों की पहचान कर इन्हें शिक्षा से जोड़ा जाए और इनके परिवार को आजीविका के वैकल्पिक साधन उपलब्ध कराए जाएं, ताकि इनका बचपन बच सके।
इस तरह ऐसे अनेक नौनिहाल बच्चे हैं जो स्कूल न जाकर पेट के लिए यहां-वहां भटकते मिलते हैं। इन बच्चों को कहीं दुत्कारा जाता है तो कहीं कुछ मिल भी जाता है।

