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2026-08-14

वृद्धाश्रम में पिता का शव दो दिन तक रखा रहा, बच्चों ने अंतिम संस्कार से किया इनकार

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, भोपाल।

एक पिता ने जिंदगीभर मेहनत कर अपने चार बच्चों को पाला और जो कुछ कमाया, उनके बीच बांट दिया था। जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर उन्हें अपनों से दूर वृद्धाश्रम में रहना पड़ा। भोपाल स्थित ‘अपना घर’ वृद्धाश्रम में 70 वर्षीय घनश्याम की मृत्यु के बाद उनके परिजन दो दिन तक उनका चेहरा देखने तक नहीं पहुँचे।

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आश्रम प्रबंधन ने उनके परिवार के आने का इंतजार किया, लेकिन बेटियों ने आने से इनकार कर दिया और बेटों ने भी पहुँचने में असमर्थता जताई। परिवार की ओर से बार-बार आश्रम प्रबंधन से ही अंतिम संस्कार करने और मृत्यु प्रमाण पत्र उपलब्ध कराने को कहा जाता रहा। आश्रम संचालिका माधुरी मिश्रा के अनुसार, घनश्याम की मृत्यु 4 अगस्त 2026 को हुई थी।

परिवार से संपर्क करने के कई प्रयासों के बावजूद कोई भी अंतिम संस्कार के लिए नहीं पहुँचा, जिसके चलते शव को दो दिन तक इस उम्मीद में रखा गया कि शायद कोई अपना आएगा। बाद में पुलिस की मदद से घनश्याम का अंतिम संस्कार कराया गया।

माधुरी मिश्रा ने बताया कि घनश्याम की मृत्यु के बाद प्रबंधन ने उनकी बेटी से संपर्क किया तो उसने कहा कि पिता ने अपनी संपत्ति बेटों को दे दी थी और उसे संपत्ति में कुछ नहीं मिला, इसलिए वह अंतिम संस्कार के लिए क्यों आए? वहीं, बेटों ने कहा कि “उन्होंने हमारे लिए किया ही क्या है।”

आश्रम में प्रवेश के समय दी गई जानकारी के अनुसार, घनश्याम इंदौर के निवासी थे और उनका परिवार भी वहीं रहता है। वे साइकिल के टायर-ट्यूब का थोक कारोबार करते थे। उनके दो बेटे और दो बेटियां हैं।

माधुरी मिश्रा ने बताया कि 80 साल के घनश्याम को परिवार का कोई सदस्य भोपाल लाकर छोड़ गया था। वे कई दिनों तक भटकते रहे और फिर रानी कमलापति रेलवे स्टेशन पर भीख माँगकर गुजारा करते रहे। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं के माध्यम से उन्हें आश्रम लाया गया, जहाँ वे करीब चार साल तक रहे।

माधुरी मिश्रा ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि बुजुर्गों की मृत्यु के बाद परिवार के नहीं पहुँचने की स्थिति में आश्रम के सामने सबसे बड़ी समस्या शव को सुरक्षित रखने की व्यवस्था का अभाव होती है। उन्होंने यह भी बताया कि कई बुजुर्गों को अपने बच्चों का सही पता तक नहीं मालूम होता, क्योंकि बच्चे माता-पिता के आधार कार्ड और दूसरे दस्तावेज अपने पास रख लेते हैं, जिससे उनके परिवार तक पहुँचना मुश्किल हो जाता है।

माधुरी मिश्रा का कहना है कि समाज में बुजुर्गों के प्रति संवेदनशीलता कम होती जा रही है और कुछ परिवारों में माता-पिता को उनकी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने कहा कि “माता-पिता ने जिंदगीभर बच्चों के लिए मेहनत की, लेकिन आज कई बच्चे उनसे पूछते हैं कि आपने हमारे लिए किया क्या?” उन्होंने बताया कि इससे पहले भी आश्रम में ऐसे कई मामले आए हैं, जैसे एक बुजुर्ग महिला की बेटियों ने उनके साथ मारपीट की और उनके गहने छीन लिए, जिसके बाद वह महिला आश्रम में रही।