बुलंद सोच, भोपाल।

भोपाल बीते 21 सालों से बिना किसी मास्टर प्लान के बढ़ रहा है, जबकि देश के अन्य राज्यों की राजधानियां और बड़े शहर नई पहचान गढ़ रहे हैं। शहर बिना किसी दिशा और कायदे-कानून के फैल रहा है। इस स्थिति के कारण भोपाल का हर नागरिक रोजाना ट्रैफिक जाम, संकरी सड़कों और अव्यवस्थित कॉलोनियों की समस्या से जूझ रहा है। हालांकि इन सालों में तीन बार नए मास्टर प्लान के ड्राफ्ट बने, लेकिन राजनीतिक अड़ंगा, बिल्डर सिंडिकेट और रसूखदारों की मिलीभगत के कारण एक भी मास्टर प्लान पर अंतिम मुहर नहीं लग सकी।
पूर्व मास्टर प्लान का क्रियान्वयन
नवदुनिया की टीम ने जब 1995 से 2005 तक प्रभावी रहे मास्टर प्लान की पड़ताल की, तब हकीकत सामने आई कि प्लानिंग के अनुरूप कई काम नहीं हुए। न राष्ट्रीय स्तरीय खेल नगर विकसित हुआ, न मार्केट बना। मास्टर प्लान की प्रस्तावित 34 में से 22 सड़कों का निर्माण नहीं हुआ, जिसे शहर की सूरत बिगड़ने की सबसे बड़ी वजह बताया गया है। यदि पुराने ही मास्टर प्लान का पालन होता तो शायद आज शहर की सूरत इतनी नहीं बिगड़ती।
ड्राफ्ट और वर्तमान स्थिति
शहर के सुनियोजित विकास के लिए नगर तथा ग्राम निवेश (टीएंडसीपी) और विशेषज्ञों ने एक-दो बार नहीं, बल्कि तीन बार मास्टर प्लान का ड्राफ्ट तैयार किया। 2005 के प्लान के निष्क्रिय होने के बाद सबसे पहले 2009 में ड्राफ्ट बना। इसके बाद 2021 और फिर 2031 के लिए ड्राफ्ट बना, लेकिन यह राजनीतिक खींचतान में उलझ गया। 2031 का ड्राफ्ट वर्ष 2020 से शासन के दफ्तरों में धूल फांक रहा है। वर्तमान में 2047 के ड्राफ्ट को तैयार करने के लिए सर्वे चल रहा है।
अधूरी परियोजनाएं और बदले गए डिजाइन
मास्टर प्लान के नक्शे में जो मिसरोद-बर्रई मास्टर प्लान रोड सीधे बनाई जानी थी, रसूखदारों और बिल्डरों को फायदा पहुंचाने के लिए उसका डिजाइन बदलकर उसे खतरनाक घुमावदार बनाया जा रहा है। सैटेलाइट इमेज में साफ नजर आ रहा है कि जहां से सड़क सीधी बनाई जानी थी, उधर कई व्यावसायिक प्रतिष्ठान संचालित हो रहे हैं। 2005 के मास्टर प्लान में प्रस्तावित अयोध्या नगर रोड से भोपाल बायपास के लिए बनाई जाने वाली चार कनेक्टिंग सड़कों का निर्माण आज तक नहीं हुआ। यदि किसी को अयोध्या नगर मुख्य मार्ग से भोपाल बायपास जाना है तो वह आनंद नगर और भानपुर से भोपाल बायपास लंबा चक्कर लगाकर पहुंचता है। भोपाल रेलवे स्टेशन से पिपलानी पेट्रोल पंप तक 80 फीट चौड़ी सीधी सड़क बननी थी, लेकिन यह सड़क सिर्फ अशोका गार्डन टंकी तक सिमट कर रह गई। स्थानीय रहवासी बताते हैं कि वर्ष 1995 के पहले से ही मकान बनने लगे थे, तब जिम्मेदार अफसरों ने ध्यान नहीं दिया, और यदि यह सड़क बनती तो आज रायसेन रोड पर ट्रैफिक का इतना अधिक दबाव नहीं होता। लंबाखेड़ा और मालीखेड़ी के बीच के बड़े इलाके को राज्य स्तरीय खेल नगर के रूप में प्रस्तावित किया गया था, लेकिन यह जगह तब से वीरान पड़ी है। यदि इधर राज्य स्तरीय खेल नगर बनाया गया होता तो, कई प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को मंच मिलता, साथ ही शहर टीटी नगर स्टेडियम पर पूरी तरह निर्भर नहीं होता। भोपाल बायपास रोड को कोलार से होते हुए सीधे नीलबड़ को जोड़ा जाना था, लेकिन यह सड़क आधी-अधूरी बनी। बीच का एक बड़ा हिस्सा खाली मैदान जैसा है, जहां सड़क का निर्माण नहीं हुआ, इस कारण नर्मदापुरम रोड पर ट्रैफिक का दबाव बढ़ा। पुराने शहर को एक सुव्यवस्थित बाजार देने के उद्देश्य से भानपुर ब्रिज के पास एक बड़ा बाजार और गार्डन बनाया जाना प्रस्तावित था, लेकिन आज भी यह जगह खाली और उजाड़ है। यहां न सुव्यवस्थित बाजार है न गार्डन, और यदि बाजार और गार्डन होता तो शहर के नागरिकों को सहूलियत होती, चौक बाजार में भीड़ कम होती और सड़कों पर ट्रैफिक का दबाव कम होता।
मास्टर प्लान अटकने के नुकसान और फायदे
मास्टर प्लान अटका रहने का नुकसान जनता का नुकसान है; 22 सड़कें न बनने से शहर का ट्रैफिक नेटवर्क ठप है। ड्रेनेज और ग्रीन जोन न होने से हल्की वर्षा में जलभराव होता है। आम नागरिक बिना जाने-पहचाने अवैध कॉलोनियों में मकान खरीदकर जिंदगी भर की कमाई गंवा रहे हैं। प्लान लागू न होने से भू-माफियाओं को कृषि भूमि पर अवैध कॉलोनियां काटने की छूट मिलती है, जिन्हें बाद में चुनावी फायदे के लिए वैध करने का खेल खेला जाता है। यदि मास्टर प्लान लागू हो जाए तो प्रस्तावित सड़कों के जुड़ने से शहर के मुख्य रास्तों का 40 प्रतिशत ट्रैफिक कम हो जाएगा, जिससे ट्रैफिक से राहत मिलेगी। कौन सा क्षेत्र रिहायशी होगा, कहां इंडस्ट्री लगेगी और कहां पार्क होंगे, यह तय होने से शहर में बेतरतीब निर्माण रुकेगा और शहर सुव्यवस्थित होगा। अवैध कॉलोनाइजेशन पर लगाम लगेगी और आम लोगों को मूलभूत सुविधाओं जैसे बिजली, पानी, सड़क वाले जायज प्लॉट मिल सकेंगे, जिससे सस्ते और सुरक्षित मकान उपलब्ध होंगे। साथ ही, भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर मेट्रोपॉलिटन रीजन बनेंगे, राजधानी में गिफ्ट सिटी बनेगी और भेल से जमीन वापसी की कवायद तेज होगी।
विशेषज्ञों की राय
कंसल्टेंट टाउन प्लानर सुयश कुलश्रेष्ठ के अनुसार, मास्टर प्लान लागू नहीं होने की एक वजह एग्जिस्टिंग लैंड प्लान की एक बड़ी खामी है, इसमें ठीक से सर्वे नहीं होता। उन्होंने बताया कि 2005 के प्लान में जो 34 सड़कें प्रस्तावित थीं, उनमें से 22 सड़कें आज तक नहीं बनीं। यह बनतीं तो यकीनन आज शहर की सड़कों पर ट्रैफिक का दबाव कम होता। कुलश्रेष्ठ ने कहा कि नया मास्टर प्लान जल्द लागू होना चाहिए, और नए प्लान में 15 प्रतिशत कमर्शियल अनुमति तथा मिक्स लैंड यूज को बढ़ावा देना चाहिए।
आधिकारिक बयान
टीएंडसीपी के संयुक्त संचालक नीरज आनंद लिखार ने बताया कि भोपाल के नए मास्टर प्लान का काम चल रहा है। इसके लिए वर्तमान में सर्वे और डेटा एकत्र किया जा रहा है।

