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2026-07-25

कॉमनवेल्थ गेम्स: भारत ने 2010 में रचा इतिहास, पदक तालिका में हासिल किया दूसरा स्थान

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच।

दिल्ली का जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम ‘भारत.भारत.’ के नारों से गूंज रहा था, जहाँ बैडमिंटन कोर्ट पर साइना नेहवाल थीं। यह सिर्फ एक फाइनल नहीं था, बल्कि पदक तालिका में भारत का भविष्य भी तय होना था। यदि साइना हार जातीं, तो मेजबान भारत तीसरे स्थान पर खिसक जाता, लेकिन उन्होंने जीत दर्ज की। इस जीत के साथ भारत का 38वां स्वर्ण पदक आया, जिससे कुल पदक 101 हो गए। पहली बार कॉमनवेल्थ गेम्स की पदक तालिका में भारत ऑस्ट्रेलिया के बाद दूसरे स्थान पर पहुंच गया। आज भी यह भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है।

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कॉमनवेल्थ गेम्स का उद्भव

भारत की यह कहानी 2010 में शुरू नहीं हुई थी, इसकी शुरुआत 76 साल पहले हुई थी, जब 1934 में सिर्फ 6 भारतीय खिलाड़ी पहली बार कॉमनवेल्थ गेम्स में उतरे थे। उस वक्त भारत पर अंग्रेजों का शासन था, लेकिन पहलवान राशिद अनवर ने कांस्य पदक जीतकर भारत का नाम इतिहास में दर्ज करा दिया। हालांकि, कॉमनवेल्थ गेम्स की कहानी इससे भी 43 साल पहले की है। कॉमनवेल्थ की कहानी 1891 में शुरू होती है, जब ब्रिटिश साम्राज्य अपने चरम पर था और दुनिया की करीब एक-चौथाई आबादी और विशाल भूभाग पर ब्रिटेन का शासन था। तब एक ब्रिटिश पादरी जॉन एस्टली कूपर ने एक ऐसा सपना देखा, जिसने बाद में दुनिया के सबसे बड़े खेल आयोजनों में से एक को जन्म दिया। उन्होंने कहा कि साम्राज्य की ताकत सिर्फ सेना से नहीं, बल्कि लोगों के रिश्तों से भी बढ़ती है। अगर ब्रिटिश साम्राज्य के अलग-अलग देशों के खिलाड़ी एक मैदान पर उतरेंगे तो आपसी भरोसा और भाईचारा मजबूत होगा। उन्होंने इसका नाम ‘पैन-ब्रिटेनिक फेस्टिवल’ दिया, लेकिन यह विचार करीब 20 साल तक कागजों में ही पड़ा रहा।

पहला आयोजन और भारत का पदार्पण

1911 में ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम का राज्याभिषेक हुआ और इसी मौके पर लंदन में फेस्टिवल ऑफ एम्पायर आयोजित किया गया। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के खिलाड़ी पहली बार एक ही आयोजन में उतरे। यह आधिकारिक कॉमनवेल्थ गेम्स नहीं थे, लेकिन इतिहासकार इसे कॉमनवेल्थ गेम्स की पहली झलक मानते हैं। यहीं लोगों को एहसास हुआ कि ऐसा आयोजन सफल हो सकता है। 1928 के एम्स्टर्डम ओलिंपिक के दौरान ब्रिटिश साम्राज्य के खेल प्रशासक मिले और यहीं फैसला हुआ कि ओलिंपिक से अलग, हर चार साल में ब्रिटिश साम्राज्य के देशों के लिए अपना एक खेल आयोजन होगा। यही वह फैसला था जिसने कॉमनवेल्थ गेम्स को जन्म दिया। 16 अगस्त 1930 को कनाडा के छोटे से शहर हैमिल्टन में पहले ब्रिटिश एम्पायर गेम्स शुरू होने वाले थे, लेकिन उस समय हवाई यात्रा आम नहीं थी और ज्यादातर खिलाड़ी समुद्री जहाजों से कनाडा पहुंचते थे। कई देशों ने यात्रा के खर्च की कमी बताई, जिस पर आयोजकों ने कई टीमों की आर्थिक मदद की। तब जाकर पहला आयोजन हो सका। पहले संस्करण में केवल 11 देशों के करीब 400 खिलाड़ी शामिल थे। इसमें सिर्फ 6 खेल- एथलेटिक्स, बॉक्सिंग, स्विमिंग, डाइविंग, कुश्ती और लॉन बॉल्स शामिल थे। कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास का पहला स्वर्ण पदक ऑस्ट्रेलिया के रोवर बॉबी पियर्स ने जीता। भारत पहली बार इन खेलों में 1934 में उतरा, जब देश ब्रिटिश भारत था। पूरे दल में सिर्फ छह खिलाड़ी थे, जिनमें से पहलवान राशिद अनवर ने कांस्य पदक जीतकर भारत का खाता खोला। यह भारत का पहला कॉमनवेल्थ पदक था, जब देश का अपना तिरंगा भी आधिकारिक राष्ट्रीय ध्वज नहीं था।

विश्व युद्ध के कारण रद्दीकरण और नाम परिवर्तन

1942 और 1946 में कॉमनवेल्थ गेम्स होने थे, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के कारण ये रद्द हो गए। इतिहास में केवल यही दो संस्करण हैं, जो विश्व युद्ध की वजह से रद्द हुए। 1950 में न्यूजीलैंड के ऑकलैंड से खेलों की वापसी हुई। 1930 में इन खेलों का नाम ब्रिटिश एम्पायर गेम्स था, लेकिन अगले तीन दशकों में दुनिया बदल गई। भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, घाना, नाइजीरिया, मलेशिया जैसे कई देश आजाद हो गए, जिससे ब्रिटिश साम्राज्य सिकुड़ने लगा और खेलों का नाम भी बदल गया।

भारत का पहला स्वर्ण पदक

1958 में कार्डिफ में मिल्खा सिंह नामक एक धावक ने 440 यार्ड दौड़ जीतकर इतिहास रच दिया। वे कॉमनवेल्थ गेम्स की एथलेटिक्स स्पर्धा में स्वर्ण जीतने वाले पहले भारतीय बने। इस जीत के बाद उन्हें ‘फ्लाइंग सिख’ कहा जाने लगा। उसी संस्करण में पहलवान लीला राम ने भी स्वर्ण पदक जीता।

भारत की मेजबानी (2010)

भारत 1934 में कॉमनवेल्थ गेम्स में शामिल हुआ और 2010 में उसने मेजबानी की, यानी 76 साल बाद। नई दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी करने वाला दक्षिण एशिया का पहला शहर बना। 71 कॉमनवेल्थ देशों और क्षेत्रों के करीब 6,000 खिलाड़ी 17 खेलों की 272 स्पर्धाओं में उतरे। भारत ने 38 स्वर्ण, 27 रजत और 36 कांस्य समेत 101 पदक जीतकर इतिहास रच दिया। पहली बार कॉमनवेल्थ गेम्स की पदक तालिका में भारत ऑस्ट्रेलिया के बाद दूसरे स्थान पर पहुंचा। आज भी यह भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है।

2026 और 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स

2026 कॉमनवेल्थ गेम्स स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आज से शुरू हो रहे हैं, जो कि 2 अगस्त तक चलेंगे। इस बार सिर्फ 10 खेल शामिल हैं। भारत ने 125 खिलाड़ियों का दल भेजा है, जो एथलेटिक्स, मुक्केबाजी, वेटलिफ्टिंग, जूडो, तैराकी, ट्रैक साइक्लिंग, जिम्नास्टिक, लॉन बॉल्स, 3×3 बास्केटबॉल और पैरा कॉम्पिटीशन में हिस्सा लेगा। मीराबाई चानू और लवलीना बोरगोहैन भारत की ध्वजवाहक होंगी। ESPN की रिपोर्ट के मुताबिक, स्कॉटलैंड के ग्लासगो में 23 जुलाई से शुरू होने वाले 2026 कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए भारत के 125 एथलीटों के दल में 77 पुरुष और 48 महिला खिलाड़ी शामिल हैं। यह पिछली बार से 85 कम है। भारतीय खिलाड़ी कुल 13 खेल विधाओं में अपनी चुनौती पेश करेंगे। वहीं, 2030 में कॉमनवेल्थ गेम्स एक बार फिर भारत लौटेंगे, जिसकी मेजबानी अहमदाबाद करेगा। 2030 में ही कॉमनवेल्थ गेम्स के 100 साल पूरे हो रहे हैं, इसलिए इसे खास माना जा रहा है।