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2026-08-07

दतिया उपचुनाव में आसपा का मजबूत प्रदर्शन, 2028 में ग्वालियर-चंबल में बड़ी चुनौती का संकेत

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, भोपाल।

ग्वालियर-चंबल अंचल में दलित राजनीति का अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इसी कारणवश एक समय यहां बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का अच्छा प्रभाव देखने को मिलता था। वर्ष 2028 के विधानसभा चुनाव में आजाद समाज पार्टी (आसपा) भी बसपा जैसा प्रभाव दिखा सकती है। इस आशय का संकेत दतिया उपचुनाव में मिला है।
आसपा प्रत्याशी दामोदर यादव ने इस उपचुनाव को न केवल त्रिकोणीय मुकाबले में बदला, बल्कि 22,527 वोट यानी 14.3 प्रतिशत वोट प्राप्त किए। आंकड़ों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि दामोदर यादव ने बसपा और कांग्रेस के वोटबैंक में सेंध लगाने के साथ ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को भी प्रभावित किया। इस उपचुनाव में भाजपा 6,016 वोटों से चुनाव हार गई।
दलित और ओबीसी (यादव) वोटों के इस नए समीकरण ने भाजपा और कांग्रेस दोनों के चुनावी गणित को बिगाड़ दिया।

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त्रिकोणीय मुकाबले का असर और भाजपा की हार

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, दामोदर यादव ने जो त्रिकोणीय मुकाबला खड़ा किया, उसने मुख्य रूप से सत्ता विरोधी वोट यानी दलित मतदाताओं के एक बड़े हिस्से को प्रभावित किया। यदि दामोदर यादव को मिले वोटों का एक छोटा हिस्सा भी भाजपा के पाले में जाता, तो हार-जीत का अंतर बदल सकता था। उनके मजबूत प्रदर्शन को भाजपा की हार का एक मुख्य कारण माना जा रहा है।
इस बात की पुष्टि दामोदर यादव के बयान से भी होती है। उन्होंने कहा कि भाजपा के वरिष्ठ नेता नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने अंतिम समय में रणनीतिक भ्रम फैलाकर उनके समर्थकों के वोट कांग्रेस की तरफ मोड़ दिए। पार्टी सूत्र भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि जो भाजपा कार्यकर्ता नाराज थे, उनमें से बहुत से लोगों ने कांग्रेस का सहयोग न कर दामोदर यादव को समर्थन दिया।
दूसरी ओर, भाजपा ने यह स्पष्टीकरण दिया कि भले ही पार्टी उपचुनाव हार गई हो, लेकिन वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले इस बार दतिया में लगभग 1,700 वोट अधिक मिले हैं।

2028 के लिए दलित वोटों की चुनौती

दतिया उपचुनाव ग्वालियर-चंबल की राजनीति के लिए पार्टियों को यह संकेत दे रहा है कि वर्ष 2028 के चुनाव में दलित वोट प्राप्त करना एक बड़ी चुनौती होगा। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में इस अंचल के दलित मतदाताओं ने एकतरफा रुख अपनाकर पूरे क्षेत्र का राजनीतिक परिणाम बदल दिया था।
इस कारण 15 साल बाद राज्य में भाजपा को सत्ता से बाहर होना पड़ा था और कांग्रेस की सरकार बनी थी। दलित वोटों के बदलाव का संकेत सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम में किए गए बदलावों के विरोध में दो अप्रैल 2018 को हुए भारत बंद के दौरान ही मिल गया था। इस बंद में व्यापक हिंसा हुई थी और आठ लोग मारे गए थे।
वर्ष 2018 में कांग्रेस ने इस अंचल की 34 में से 26 सीटों पर जीत दर्ज की थी। जबकि वर्ष 2013 में कांग्रेस को सिर्फ 12 सीटें मिली थीं। भाजपा सिमटकर मात्र सात सीटों पर रह गई, जबकि वर्ष 2013 में भाजपा ने यहां 20 सीटें जीती थीं।

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