बुलंद सोच, दतिया।
दतिया विधानसभा उपचुनाव में हार के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। मंगलवार को भोपाल में चली मंथन बैठक के उपरांत दतिया जिला भाजपा कार्यकारिणी को भंग कर दिया गया।
पार्टी ने उपचुनाव में मिली हार का ठीकरा नरोत्तम समर्थकों की टीम मानी जाने वाली भाजपा कार्यकारिणी पर फोड़ा है। इस कार्यकारिणी में जिलाध्यक्ष रघुवीरसिंह कुशवाह को डॉ. नरोत्तम मिश्रा का समर्थक माना जाता है।
पूर्व में जब पार्टी आलाकमान ने पूर्व गृहमंत्री डॉ. मिश्रा का टिकट बदला था, तब यह पूरी कार्यकारिणी सामूहिक रूप से इस्तीफा देने को खड़ी हो गई थी। इसके अलावा, कार्यकारिणी में महामंत्री से लेकर उपाध्यक्ष और सभी मंडल अध्यक्ष तथा मोर्चा प्रभारी भी नरोत्तम टीम के ही बताए जाते हैं।
भाजपा के जिला कार्यालय को भी समर्थकों ने अपने उपद्रव का अखाड़ा बनाया था। यहां डॉ. मिश्रा की एक मात्र कार्यकर्ता बैठक के अतिरिक्त कोई चुनावी गतिविधि नहीं हुई और पूरे चुनाव में सन्नाटा पसरा रहा।
उपचुनाव निकट होने के कारण प्रदेश आलाकमान ने उस समय इतने बड़े विरोध को शांत करने के लिए इस्तीफे स्वीकार न करने की रणनीति अपनाई थी, ताकि पार्टी का डैमेज कंट्रोल किया जा सके।
इसी कारण प्रदेशाध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल सहित मुख्यमंत्री मोहन यादव और प्रदेश प्रभारी महेंद्र सिंह ने दतिया में लगातार आकर चुनावी कमान पर निगरानी बनाए रखी, जिसके चलते भाजपा की हार का आंकड़ा चार अंकों में सीमित रह पाया।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, इस उपचुनाव में भीतरघाती इस स्तर पर सक्रिय थे कि वे हार का आंकड़ा 20 हजार तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे थे। कांग्रेस की दतिया में जीत का यह सबसे बड़ा कारण भी बताया गया है।
चुनाव परिणाम आने के बाद जहां कांग्रेस खेमे में जश्न का माहौल है, वहीं भाजपा के कई स्थानीय खेमों में सन्नाटा पसरा हुआ है।
पार्टी ने हार के कारणों की समीक्षा के लिए दो सदस्यीय समिति गठित की है और संगठनात्मक मंथन का दौर जारी है। जिला कार्यकारिणी भंग होने और भीतरघात के आरोपों ने दतिया के राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया है।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं विधायक हेमंत खंडेलवाल ने प्रदेश महामंत्री गौरव रणदिवे और वरिष्ठ नेता अंबाराम कराड़ा को समीक्षा समिति में शामिल किया है। यह समिति दतिया में चुनाव से जुड़े पदाधिकारियों, वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं से चर्चा कर यह पता लगाएगी कि किन कारणों से पार्टी उपचुनाव में अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी चुनाव परिणाम के बाद भोपाल पहुंचे थे। मंगलवार को हुई मंथन एवं समीक्षा बैठक में उन्होंने कुछ ऑडियो और वीडियो भी प्रदेश नेतृत्व के समक्ष रखे जाने की चर्चा है। इन सामग्रियों में कथित तौर पर चुनाव के दौरान पार्टी के विरुद्ध गतिविधियों का उल्लेख बताया जा रहा है।
चर्चा यह भी है कि करीब दो दर्जन पार्षदों पर पार्टी के साथ भीतरघात करने के आरोप लगाए गए हैं। इनमें से अधिकांश को पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का समर्थक माना जा रहा है। हालांकि, पार्टी की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
जिन भाजपा नेताओं पर 10 और 11 जुलाई को नेशनल हाईवे पर जाम लगाने और उपद्रव के मामले में एफआईआर दर्ज हुई थी, उनके भी फिलहाल शहर से बाहर होने की चर्चा है। इनमें से अधिकांश के मोबाइल भी स्विच ऑफ मिले हैं। राजनीतिक गलियारों में इसे हार के बाद की रणनीतिक दूरी के रूप में देखा जा रहा है।
हार का विश्लेषण और भविष्य की रणनीति
उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी भले ही जीत हासिल नहीं कर सके, लेकिन लगभग 6,016 मतों के अंतर से मिली हार ने संगठन को यह संदेश दिया है कि नया चेहरा भी दतिया की राजनीति में प्रभाव छोड़ सकता है।
चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि संगठन ने जोखिम उठाकर नए चेहरे को मौका दिया और अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन ने पार्टी को भविष्य के लिए एक विकल्प प्रदान किया है।
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी तेज है कि यदि भाजपा ने ‘बसई फॉर्मूला’ अपनाया होता तो परिणाम अलग हो सकते थे। बसई क्षेत्र में पार्टी ने स्थानीय और जमीन से जुड़े नेताओं को प्राथमिकता दी थी तथा उन चेहरों को सीमित रखा गया था, जिनके प्रति क्षेत्र में असंतोष था।
वहां स्थानीय पहचान रखने वाले जनप्रतिनिधियों को सक्रिय संपर्क अभियान में लगाया गया, जिसका लाभ पार्टी को मिला था।
अब निगाहें भाजपा की समीक्षा समिति की रिपोर्ट पर टिक गई हैं। यह रिपोर्ट न केवल दतिया उपचुनाव की हार के कारणों को उजागर करेगी, बल्कि आने वाले स्थानीय नेतृत्व की दिशा भी तय कर सकती है।
दतिया उपचुनाव में टिकट बदलने के बाद से ही गहमागहमी शुरू हो गई थी। जुलाई में दो दिन दतिया में मचे उपद्रव, किला चौक पर पार्टी के कार्यकर्ता सम्मेलन में डॉ. नरोत्तम मिश्रा के आंसू और इंटरनेट मीडिया पर लगातार भाजपा से जुड़े कार्यकर्ताओं के पार्टी प्रत्याशी के विरुद्ध पोस्ट ने यह जता दिया था कि सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।
भाजपा के दिग्गज नेता इस स्थिति पर पर्दा डाले रहे और कहते रहे कि सभी रूठों को मना लिया गया है, लेकिन चुनाव परिणाम ने इसे पूरी तरह गलत साबित किया। अब हार की समीक्षा के बाद जिला कार्यकारिणी को भंग कर आलाकमान ने यह संदेश दिया है कि अब संगठन से जुड़े लोगों को ही महत्व दिया जाएगा, ताकि किसी व्यक्ति विशेष की जगह पार्टी के निष्ठावानों को आगे लाया जा सके।
आशुतोष तिवारी की हार का अंतर भाजपा के लिए निराशाजनक हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उपचुनाव में किसी नए चेहरे को उतारना हमेशा जोखिम भरा होता है, लेकिन लगभग छह हजार मतों का अंतर यह संकेत देता है कि मतदाताओं ने उन्हें पूरी तरह नकारा नहीं। संगठन के भीतर भी यह चर्चा है कि यदि स्थानीय स्तर पर समन्वय बेहतर रहता और सभी खेमे एकजुट होकर काम करते, तो मुकाबला और अधिक कांटे का हो सकता था।
भाजपा के अंदर सबसे अधिक चर्चा कथित भीतरघात को लेकर है। सूत्रों के अनुसार, कुछ पार्षदों और स्थानीय नेताओं की गतिविधियों पर सवाल उठाए गए हैं। बताया जा रहा है कि चुनाव के दौरान कुछ स्थानों पर पार्टी के आधिकारिक अभियान को अपेक्षित सहयोग नहीं मिला।
यही कारण है कि समीक्षा बैठक में कथित ऑडियो और वीडियो सामग्री पर भी चर्चा होने की बात सामने आई। हालांकि पार्टी नेतृत्व ने अभी तक किसी नेता या पार्षद के खिलाफ कार्रवाई की घोषणा नहीं की है, लेकिन फिलहाल संगठनात्मक अनुशासन को लेकर सख्त संदेश दिया है।
बसई क्षेत्र में भाजपा की चुनावी रणनीति को अब उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है। वहां पार्टी ने स्थानीय स्तर पर लोकप्रिय और सक्रिय नेताओं को आगे रखा था तथा क्षेत्रीय असंतोष पैदा करने वाले चेहरों को सीमित भूमिका दी गई थी।
कार्यकर्ताओं के अनुसार, स्थानीय संपर्क, घर-घर पहुंच और क्षेत्रीय नेतृत्व पर भरोसा वहां की सफलता का प्रमुख कारण बना। दतिया उपचुनाव के बाद पार्टी के भीतर यह चर्चा तेज हो गई है कि भविष्य के चुनावों में स्थानीय सामाजिक समीकरणों और जमीनी नेतृत्व को अधिक महत्व देना होगा। यही बसई मॉडल अब संगठनात्मक बहस का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है।

