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2026-08-12

केवड़ेश्वर महाकाल शिव मंदिर: 12-13वीं सदी में शिप्रा कुंडों के पास स्थापित

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, इंदौर।

प्राचीन केवड़ेश्वर महाकाल शिव मंदिर इंदौर तहसील के तिल्लौर खुर्द ग्राम के समीप स्थित है। यह मंदिर इंदौर और आसपास के श्रद्धालुओं की आस्था का पवित्र केंद्र है। आश्रमनुमा यह मंदिर सिद्ध महाकाल शिव मंदिर के रूप में प्रसिद्ध है। इतिहासकारों के अनुसार, इसका निर्माण 800 वर्ष पूर्व किया गया था। यह इंदौर शहर से लगभग 20 किलोमीटर दूर है और 12-13वीं सदी का माना जाता है।

शिप्रा नदी से संबंध

यह स्थान पुण्य सलिला मोक्षदायनी शिप्रा नदी का उद्गम स्थल माना जाता है। हालांकि, शिप्रा का वास्तविक उद्गम स्थल विंध्याचल पर्वत श्रृंखला की कोकरी बड़ली पहाड़ी पर है। महंतों और संतों की मान्यता है कि केवड़ेश्वर मंदिर के समीप गुप्त रूप से शिप्रा का निवास है। इसी पहाड़ी पर तीन कुंड स्थित हैं, जो जीर्णोद्धार के कारण नवीन प्रतीत होते हैं। यह शिव मंदिर इन्हीं कुंडों के उत्तर-पूर्वाभिमुख स्थित है।

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नामकरण और ऐतिहासिक संदर्भ

केवड़ेश्वर नामकरण को लेकर यह मान्यता है कि किसी कालखंड में इस स्थान पर केवड़े के पेड़ बहुत अधिक संख्या में रहे थे। केवड़े के पेड़ में लगने वाला फूल केवड़ा कहलाता है, जो अत्यंत सुगंधित होता है। केवड़ेश्वर शिव मंदिर के समीप कुछ लोगों ने निवास करना शुरू कर दिया है। तिल्लौर खुर्द ग्राम का उल्लेख होलकर कालीन इतिहास की किताबों में मिलता है। कैप्टन एल. सी. धारीवाल के 1931 में प्रकाशित इंदौर जिला गजेटियर के अनुसार, 1921 में तिल्लौर खुर्द की आबादी 716 दर्ज की गई थी।

11 अगस्त को प्रदीप मिश्रा के आह्वान पर घर-घर पार्थिव शिवलिंग बनाए जाएंगे, जिसमें करोड़ों भक्त जुड़ेंगे।

मंदिर की संरचना और जीर्णोद्धार

केवड़ेश्वर शिव मंदिर का शिवलिंग स्वयं प्रकट हुआ है, जिसके कारण यह मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र है। मंदिर का जीर्णोद्धार होलकर राजाओं ने करवाया था। मंदिर की संरचना, गर्भगृह और द्वार परमार कालीन हैं। मंदिर प्रांगण में शिव प्रतिमाएं और नंदी की प्रतिमा विराजित हैं। मंदिर की दीवार पर गणेश जी की प्रतिमा मुद्रित है। समीप ही सुंदर घाटों का निर्माण किया गया है। मंदिर के पीछे के भाग में महात्माओं की समाधि, निवास, गुफाएं और महंतों के रहने का स्थान है। मंदिर प्रांगण में विशाल वृक्षों की एक श्रृंखला भी है, जो अत्यंत प्राचीन प्रतीत होते हैं।

आध्यात्मिक विरासत

मंदिर के आसपास विशाल और घने वृक्ष हैं। वर्तमान में मंदिर का दायित्व धर्मेंद्रपुरी महाराज संभाल रहे हैं। केवड़ेश्वर महाकाल मंदिर बाबा दूधाधारी महाराज की तपोस्थली है, जहां बाबा घने जंगल में साधना करते थे। घने जंगल की वजह से मंदिर में जंगली जानवरों का भय रहता था, परंतु वे भी देव दर्शन कर चले जाते थे। इस स्थान पर अखंड चैतन्य धुनी कई वर्षों से प्रज्वलित है। यहां बाबा त्र्यंबक पुरी महाराज ने 108 वर्ष तक तपस्या की थी। घने पेड़ और आसपास के मनोरम स्थल के कारण यहां कई लोग दर्शन हेतु आते हैं।

समीपवर्ती ऐतिहासिक स्थल

केवड़ेश्वर महाकाल शिव मंदिर से कुछ दूरी पर कंपेल स्थित है, जो होलकर राजाओं का आरंभिक जिला मुख्यालय था। यहां देवी अहिल्या बाई की कचहरी थी। केवड़ेश्वर जाने वाले मुख्य मार्ग पर पहले देवगुराड़िया का गुटकेश्वर महादेव मंदिर आता है, जिसका जीर्णोद्धार देवी अहिल्या बाई ने करवाया था। केवड़ेश्वर महाकाल मंदिर देवगुराड़िया और कंपेल के बीच में स्थित है। सावन माह और विशेष अवसरों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु इन दोनों मंदिरों में दर्शन के लिए आते हैं।