बुलंद सोच।
देश के कई राज्यों में बायोमेडिकल यानी अस्पतालों से निकलने वाले कचरे के निपटान को लेकर गंभीर लापरवाही सामने आई है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) को सूचित किया है कि 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बायोमेडिकल कचरे के निपटान से जुड़े नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है। यह मामला अस्पतालों में कचरे को जमीन में गहराई तक दबाकर निपटाने यानी ‘डीप बरीअल’ से संबंधित है। इस व्यवस्था में नियमों की अनदेखी पर्यावरण और भूजल के लिए खतरा पैदा कर सकती है। विशेष रूप से, उत्तर प्रदेश के सभी 111 और राजस्थान के सभी 33 संबंधित स्वास्थ्य केंद्र नियमों का पालन करते नहीं पाए गए।
स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति
सीपीसीबी की रिपोर्ट के अनुसार, देश में 9,178 स्वास्थ्य केंद्र बायोमेडिकल कचरे के लिए ‘डीप बरीअल’ व्यवस्था का उपयोग कर रहे थे। इनमें से केवल 5,715 स्वास्थ्य केंद्र ही निर्धारित मानकों के अनुरूप पाए गए। सबसे बड़ी खामी 477 स्वास्थ्य केंद्रों में देखी गई, जहाँ कचरा दबाने वाली जगह और भूजल स्तर के बीच कम से कम छह मीटर की दूरी बनाए रखने के नियम का पालन नहीं किया गया। इसके अतिरिक्त, 341 स्वास्थ्य केंद्रों के पास संबंधित प्राधिकरण की आवश्यक मंजूरी भी नहीं थी। यह स्थिति दर्शाती है कि कचरे के निपटान में केवल व्यवस्था की कमी ही नहीं, बल्कि आवश्यक अनुमति और सुरक्षा मानकों की भी अनदेखी हुई है।
'डीप बरीअल' के नियम
बायोमेडिकल कचरे को जमीन में गहराई तक दबाना एक सामान्य तरीका नहीं है। बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट नियमों के तहत इसकी अनुमति केवल ग्रामीण या दूरदराज के उन इलाकों में सीमित परिस्थितियों में है, जहाँ साझा बायोमेडिकल कचरा उपचार सुविधा उपलब्ध नहीं है। इसके लिए संबंधित राज्य प्राधिकरण से पहले मंजूरी लेना अनिवार्य है। साथ ही, कचरे को दबाने वाली जगह और भूजल स्तर के बीच कम से कम छह मीटर की दूरी होनी चाहिए। इन नियमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अस्पतालों से निकलने वाला संक्रमित या खतरनाक कचरा मिट्टी और भूजल को प्रदूषित न करे। हालांकि, जाँच में कई केंद्र इन बुनियादी शर्तों पर खरे नहीं उतरे।
कार्रवाई और अगली सुनवाई
सीपीसीबी ने एनजीटी को बताया है कि नियम तोड़ने वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के संबंधित प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और समितियों को सूचना भेज दी गई है। इन्हें नियमों का पालन करने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया गया है। यदि निर्धारित अवधि में सुधार नहीं हुआ, तो पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 5 के तहत निर्देश जारी किए जा सकते हैं। इस प्रावधान के तहत केंद्र सरकार बाध्यकारी आदेश जारी कर सकती है, जिसमें किसी गतिविधि को नियंत्रित करने या बंद करने और बिजली-पानी जैसी सेवाओं को रोकने तक की कार्रवाई शामिल हो सकती है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण इस मामले में बायोमेडिकल कचरे के उपचार, रखरखाव और निपटान से जुड़ी कमियों की निगरानी कर रहा है। अधिकरण ने सीपीसीबी को आगे की कार्रवाई की प्रगति रिपोर्ट अगली सुनवाई से कम से कम एक सप्ताह पहले दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस मामले की अगली सुनवाई 28 अक्तूबर 2026 को निर्धारित है। अब यह देखना होगा कि आठ सप्ताह की अवधि में नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए राज्य क्या कदम उठाते हैं, विशेषकर उत्तर प्रदेश और राजस्थान में सभी संबंधित स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति में कितना सुधार होता है।

