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भरण-पोषण तय करने से पहले पति-पत्नी की आय का पूर्ण आकलन अनिवार्य: MP हाई कोर्ट

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, जबलपुर।

हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति द्वारिकाधीश बंसल की एकलपीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि भरण-पोषण के मामलों में पति-पत्नी की वास्तविक आय, संपत्ति, खर्च और वित्तीय दायित्वों का पूरा आकलन किए बिना मेंटेनेंस तय नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने दमोह फैमिली कोर्ट द्वारा पारित 15 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण के आदेश को निरस्त कर मामला पुनः सुनवाई के लिए वापस भेज दिया। साथ ही, प्रदेश की सभी फैमिली कोर्टों और भरण-पोषण मामलों की सुनवाई करने वाली अदालतों के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए गए।

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मामले का विवरण

दरअसल, दमोह निवासी शैलेंद्र राय ने 16 जुलाई, 2025 के एक आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश में पत्नी प्रगति राय को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत 15 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। पति का कहना था कि उसकी शुद्ध मासिक आय 29,134 रुपये है, जबकि फैमिली कोर्ट ने बिना समुचित वित्तीय मूल्यांकन के लगभग आधी आय के बराबर राशि तय कर दी।

हाई कोर्ट की टिप्पणियां और निर्देश

हाई कोर्ट ने पाया कि सुप्रीम कोर्ट के रजनीश बनाम नेहा-2021 के अनुरूप आय व देनदारियों का अनिवार्य शपथपत्र रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं था, जबकि आदेश-पत्र में उसके दाखिल होने का उल्लेख था। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नई सुनवाई तक पति 15 हजार रुपये प्रतिमाह देता रहेगा, क्योंकि उसने भी आवश्यक वित्तीय शपथपत्र प्रस्तुत नहीं किया था। कोर्ट ने निर्देश दिया कि भविष्य में प्रत्येक अंतरिम व अंतिम भरण-पोषण आदेश के पहले पैराग्राफ में यह स्पष्ट लिखा जाए कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का पालन हुआ है या नहीं।

वन्यजीव संरक्षण नीति

MP हाई कोर्ट ने राज्य को समय दिया है, जिसमें वन्यजीव संरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के अनुरूप नीति बनाई जाएगी।