बुलंद सोच, भोपाल।

केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद संदिग्ध बांग्लादेशियों को चिह्नित कर वापस भेजने का अभियान मध्य प्रदेश में जारी है। इस अभियान के तहत अभी तक 30 बांग्लादेशियों को वापस भेजा जा चुका है। जांच के दौरान इनके पास भारतीय होने का कोई वैध दस्तावेज नहीं मिला था।
पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) कैलाश मकवाणा ने अधिकारियों के साथ कानून-व्यवस्था की समीक्षा करते हुए कहा है कि इस अभियान की लगातार समीक्षा करने की आवश्यकता है। उन्होंने संदिग्ध बांग्लादेशी मिलने पर गहराई से पड़ताल करने पर जोर दिया।
डीजीपी मकवाणा ने निर्देश दिए कि जिस राज्य से संदिग्ध के पहचान दस्तावेज बने हैं, वहां के गृह मंत्रालय की मदद से पड़ताल की जाए कि वे सही हैं या नहीं।
इसी सप्ताह ग्वालियर में क्राइम ब्रांच द्वारा 13 संदिग्ध बांग्लादेशियों को पकड़े जाने के बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। पुलिस इन पकड़े गए संदिग्धों के दस्तावेजों का सत्यापन और उनसे पूछताछ कर रही है।
इसी क्रम में, सीहोर जिले में 27 वर्ष से अवैध रूप से रह रहे एक बांग्लादेशी नागरिक को जिला सत्र न्यायालय ने सात साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है।
पुलिस ने संदिग्ध बांग्लादेशियों के सत्यापन के लिए एक विशेष पोर्टल भी बनाया है। इस पोर्टल पर उनकी पूरी जानकारी डाली जा रही है, जिससे सत्यापन प्रक्रिया में आसानी हुई है। यह पोर्टल व्यक्ति का पूरा ब्यौरा, यहां तक कि यदि कोई आपराधिक रिकॉर्ड है तो उसे भी सामने ले आता है।
केंद्र सरकार ने जून 2025 में सभी राज्यों से संदिग्ध बांग्लादेशियों की पहचान करने और उनके दस्तावेजों का सत्यापन कराने के लिए कहा था।
इसके बाद तत्कालीन मुख्य सचिव अनुराग जैन ने गृह व अन्य संबंधित विभागों और पुलिस अधिकारियों के साथ एक बैठक की थी। इस बैठक में संदिग्धों को चिह्नित करने के तरीकों और आगे की प्रक्रिया पर विस्तृत चर्चा हुई थी।
सभी जिलों में थाना प्रभारियों को इन संदिग्धों को चिह्नित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उनकी पहचान के लिए उनकी भाषा और काम को मुख्य आधार बनाया गया।
इस अभियान में कुल 3,278 लोगों को चिह्नित किया गया था।
सभी प्रकार के सत्यापन के बाद मार्च 2026 तक 19 बांग्लादेशियों को उनके देश वापस भेजा गया था, और अब यह संख्या बढ़कर 30 तक पहुंच गई है।
अप्रैल के पहले, संदिग्धों के दस्तावेजों की पड़ताल के लिए पुलिस की 20 सदस्यीय टीम बंगाल गई थी। वहां की पड़ताल में अंतिम रूप से 19 ही ऐसे मिले थे, जिनके पास कोई वैध दस्तावेज नहीं था।

