बुलंद सोच, भोपाल।
अस्पतालों में जन्म के तुरंत बाद बच्चे को स्तनपान कराने की पहल में वृद्धि हुई है, लेकिन घर पहुंचने के बाद यह कायम नहीं रह रही है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6 (एनएफएचएस-6) के अनुसार, प्रदेश में जन्म के पहले घंटे के भीतर स्तनपान कराने वाली माताओं का प्रतिशत 41.3 से बढ़कर 49.9 हो गया है। हालांकि, छह माह तक सिर्फ मां का दूध पिलाने वाली माताओं का प्रतिशत 74 से घटकर 56.4 रह गया है। यह चिंता का विषय है कि इसी अवधि के दौरान प्रदेश में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में डायरिया 6.4 प्रतिशत से बढ़कर 10.5 प्रतिशत हो गया है।
विशेषज्ञों की राय और लाभ
विशेषज्ञों का कहना है कि छह माह तक मां का दूध शिशु को डायरिया, आंतों के संक्रमण और कई अन्य संक्रमणों से बचाता है। एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग से डायरिया के कारण अस्पताल में भर्ती होने का जोखिम 72 प्रतिशत तक और श्वसन संक्रमण का खतरा 57 प्रतिशत तक कम हो सकता है। यह शिशु मृत्युदर में भी 15-20 प्रतिशत तक कमी ला सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, मां का दूध डायरिया, निमोनिया और श्वसन संक्रमण जैसी कई बीमारियों से रक्षा करता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में पोषण की चुनौती
मध्यप्रदेश के ग्रामीण इलाकों में छह महीने तक केवल मां का दूध पिलाने का प्रतिशत 55.8 पर सिमट गया है। इसी सर्वे में ग्रामीण क्षेत्रों में 42 प्रतिशत बच्चे कम वजन के, 33.2 प्रतिशत ठिगने कद के और 24.9 प्रतिशत दुबले पाए गए हैं, जो पोषण की गंभीर चुनौती की ओर इशारा करते हैं। बच्चे की वृद्धि के लिए पहले पानी जैसा और फिर गाढ़ा दूध, दोनों आवश्यक हैं।
महत्वपूर्ण एंटीबॉडी की आपूर्ति
एनएचएम के पूर्व डायरेक्टर डॉ. पंकज शुक्ला ने बताया कि पहले छह महीनों के लिए एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग निमोनिया जैसे श्वसन संक्रमण विकसित करने के शिशु के जोखिम को काफी कम कर देती है। मानव दूध महत्वपूर्ण एंटीबॉडी की आपूर्ति करता है।

