बुलंद सोच, इंदौर।

मध्य प्रदेश के पूर्व मंत्री और छह बार विधायक रहे पारस जैन का सोमवार सुबह 77 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ थे और इंदौर के एक निजी अस्पताल में उपचाररत थे। देर शाम जैन धर्म की परंपराओं के अनुसार उनका अंतिम संस्कार किया गया।
श्री जैन ने अपने निधन से लगभग तीन दिन पूर्व संथारा लिया था।

उनके निधन पर भाजपा नेताओं, सामाजिक संगठनों और उनके समर्थकों ने दुख व्यक्त किया।
उनके निधन के बाद बचपन के मित्रों और लंबे समय तक राजनीतिक सफर में साथ रहे सहयोगियों ने उनके जीवन से जुड़े कई अनसुने किस्से साझा किए, जो उनकी सादगी, समय की पाबंदी और जमीन से जुड़े व्यक्तित्व की गवाही देते हैं।

11 मार्च 1978 को महिदपुर निवासी अंगूरबाला जैन से उनका विवाह हुआ था। उनके मित्र पुरुषोत्तम टेलर बताते हैं कि बारात निकलने का समय हो चुका था, लेकिन घोड़ी नहीं पहुंची थी।
कुछ देर इंतजार के बाद पारस जैन ने घड़ी देखी और कहा कि मुहूर्त नहीं निकलना चाहिए। इसके बाद वे बिना घोड़ी के ही बारात लेकर पैदल निकल पड़े।

रास्ते में घोड़ी पहुंचने पर वे उस पर सवार होकर विवाह स्थल तक पहुंचे। यह घटना आज भी उनके मित्रों के बीच चर्चा का विषय है।
पारस जैन का जन्म 1950 में हुआ था। वे उज्जैन के कंठाल चौराहे पर किराए के मकान में रहते थे।

उनके मित्र पुरुषोत्तम टेलर, जो पहली कक्षा से लेकर कॉलेज तक उनके साथ पढ़े थे, बताते हैं कि छात्र जीवन से ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े रहे।
इसी दौरान उन्होंने घर के सामने कंट्रोल (राशन) की दुकान संचालित की। बाद में तांगा चालकों के घोड़ों के लिए चने से बनी ‘चंदी’ बेचने का काम भी किया।
इसके बाद उन्होंने अनाज का व्यवसाय शुरू किया और मंडी में दुकान खोली।
पुरुषोत्तम टेलर के अनुसार, पारस जैन ने कभी पार्टी से टिकट नहीं मांगा।
उनकी साफ छवि, संगठन में सक्रियता और समाज में स्वीकार्यता को देखते हुए, संघ से जुड़े सालिग्राम तोमर ने पहली बार उन्हें चुनाव लड़ने का सुझाव दिया।
इसके बाद वे लगातार राजनीति में आगे बढ़ते गए और छह बार विधायक चुने गए।
करीबी मित्र बताते हैं कि मंत्री बनने के बाद भी पारस जैन का जीवन नहीं बदला। वे शहर में आने-जाने के लिए अक्सर एक्टिवा का इस्तेमाल करते थे।
वे स्वयं सब्जी खरीदने बाजार निकल जाते थे। उन्हें मालवा की दाल-बाटी बेहद पसंद थी।
कॉलेज के दिनों में मित्रों के साथ नरसिंह घाट पर होने वाली दाल-बाटी पार्टियों में आटा गूंथने का काम भी वही करते थे। वे अच्छे तैराक भी थे और नरसिंह घाट से रामघाट तक तैरकर जाने के लिए जाने जाते थे।
भाजपा के वरिष्ठ नेता जगदीश अग्रवाल बताते हैं कि एक बार पार्टी ने पारस जैन को उज्जैन उत्तर की बजाय महिदपुर से चुनाव लड़ने का संकेत दिया था।
वे इस फैसले से असहमत थे और लगातार उज्जैन उत्तर से ही चुनाव लड़ने की बात कहते रहे। बाद में पार्टी ने उनका टिकट उज्जैन उत्तर से ही तय किया और उन्होंने रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज की।
जगदीश अग्रवाल के अनुसार, मंत्री रहते हुए भी पारस जैन जनता के मुद्दों पर समझौता नहीं करते थे। वर्ष 2010 के आसपास पिपली नाका क्षेत्र में जलभराव की समस्या को लेकर उन्होंने अधिकारियों को कई बार निर्देश दिए थे, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई।
इसके बाद वे स्थानीय लोगों के साथ अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने पर बैठ गए थे।
करीब नौ महीने पहले पारस जैन ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि अब वे कोई चुनाव नहीं लड़ेंगे।
उनका कहना था कि अब समय बदल गया है और राजनीति में भी बहुत परिवर्तन आ चुका है।
उन्होंने पार्टी नेतृत्व को सलाह दी थी कि वरिष्ठ और जमीनी कार्यकर्ताओं को सम्मान और उचित स्थान मिलना चाहिए।
पारस जैन कुल छह बार उज्जैन उत्तर विधानसभा से विधायक चुने गए: 1990, 1993 और 2003 से 2018 तक। वे वन, स्कूल शिक्षा, उच्च शिक्षा, खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण और ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री रहे।
वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उनका टिकट काटकर अनिल जैन कालूहेड़ा को उम्मीदवार बनाया था। इसके बाद वे सक्रिय राजनीति से लगभग दूर हो गए थे।
उनके निधन के साथ उज्जैन की राजनीति का एक सादगीपूर्ण और जनसरोकारों से जुड़ा अध्याय भी समाप्त हो गया।

