BREAKING NEWS
2026-08-14

सांची में बुद्ध के प्रमुख शिष्यों के अस्थि कलशों के सालभर दर्शन की तैयारी

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, रायसेन।

भगवान बुद्ध के प्रमुख शिष्यों- सारिपुत्र और महामोग्गलान के सांची में रखे पवित्र अस्थि कलशों के दर्शन की वर्तमान व्यवस्था बदलने वाली है। अभी इन अस्थि कलशों के दर्शन वर्ष में केवल दो दिन होते हैं। अब बौद्ध धर्म के अनुयायियों और आम श्रद्धालुओं को वर्षभर प्रतिदिन इनके दर्शन कराने की तैयारी की जा रही है। इस संबंध में केंद्र सरकार के निर्देश पर राज्य सरकार ने पवित्र कलशों की संरक्षक महाबोधि सोसाइटी आफ श्रीलंका एंड सांची और रायसेन जिला प्रशासन को प्रस्ताव दिया है। केंद्र सरकार चाहती है कि आम श्रद्धालुओं के साथ ही देश-विदेश से आने वाले लोगों के लिए इन अस्थि कलशों के दर्शन की व्यवस्था सदैव उपलब्ध रहे।

Advertisement

सुरक्षा पर महाबोधि सोसाइटी की चिंता

पवित्र अस्थि कलशों के धार्मिक-ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए महाबोधि सोसाइटी इस प्रस्ताव पर अमल से पहले सुरक्षा व्यवस्था को लेकर निश्चिंत होना चाहती है। सोसायटी की ओर से इस संबंध में केंद्र और राज्य सरकार को लिखा गया है। इस बीच, रायसेन जिला प्रशासन अपने स्तर पर तैयारियां शुरू कर रहा है।

चेतियागिरी बौद्ध विहार में स्थापना और वार्षिक दर्शन

इन पवित्र अस्थि कलशों को वर्ष 1952 में मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित सांची के चेतियागिरी बौद्ध विहार में स्थापित किया गया था। स्थापना के बाद से इन्हें वर्ष में केवल नवंबर के आखिरी शनिवार और रविवार को ही तलघर से बाहर निकाला जाता रहा है। इन दिनों सांची में एक मेला लगता है और देश-विदेश से बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म के अनुयायी दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं।

अस्थि कलशों की अंतर्राष्ट्रीय यात्राएं

वर्ष 2024 में पहली बार इन पवित्र अवशेषों को देश से बाहर थाईलैंड भेजा गया था। इसी वर्ष इन्हें 10 दिन के लिए मंगोलिया भी भेजा गया था। भोपाल में पांच से आठ अगस्त तक आयोजित ब्रिक्स देशों के संस्कृति मंत्रियों के सम्मेलन के दौरान भी संस्कृति विभाग के आग्रह पर परंपरा तोड़कर इन अस्थि कलशों को बाहर निकाला गया था। सांची पहुंचे ब्रिक्स सम्मेलन के प्रतिनिधिमंडल ने उस समय इनके दर्शन किए थे।

बुद्ध के प्रमुख शिष्यों का महत्व

सारिपुत्र को भगवान बुद्ध का ‘प्रज्ञा में सर्वोच्च’ (अग्गपञ्ञा) शिष्य माना जाता है। उनका मूल नाम उपतिस्स था। बौद्ध ग्रंथों में सारिपुत्र को धम्म के प्रमुख व्याख्याकार के रूप में चित्रित किया गया है। उनका निधन बुद्ध के परिनिर्वाण से पहले ही हो गया था। महामोग्गलान (महामौद्गल्यायन) भगवान बुद्ध के दूसरे प्रमुख शिष्य थे। उनका मूल नाम मोग्गलान था। बौद्ध परंपरा उन्हें ‘ऋद्धि/अलौकिक शक्तियों में सर्वोच्च’ शिष्य मानती है। उन्हें ध्यान और आध्यात्मिक साधना में असाधारण उपलब्धियों के लिए जाना जाता है।

विरासत की वापसी का इतिहास

ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में सारिपुत्र और महामोग्गलान की स्मृति में सांची के स्तूप संख्या-तीन का निर्माण किया गया था। इस स्तूप में उनके अस्थि कलश रखे गए थे। वर्ष 1851 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संस्थापक जनरल एलेक्जेंडर कनिंघम ने स्तूप की खुदाई की थी, जिसमें ये अस्थि कलश मिले और उनकी पहचान की गई। वर्ष 1866 में इन पवित्र अवशेषों को इंग्लैंड के विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम में रख दिया गया था। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, महाबोधि सोसाइटी आफ इंडिया के तत्कालीन अध्यक्ष श्यामाप्रसाद मुखर्जी और महाबोधि सोसाइटी आफ श्रीलंका के प्रयासों से इन्हें इंग्लैंड से वापस लाया गया था। पहले इन्हें कोलंबो और फिर वर्ष 1952 में सांची के चेतियागिरी विहार में स्थापित किया गया।

कलेक्टर रायसेन का बयान

रायसेन कलेक्टर अरुण कुमार विश्वकर्मा ने बताया कि सांची के चेतियागिरी विहार में रखे अस्थि कलश बहुत महत्वपूर्ण धरोहर हैं। उन्होंने कहा कि देश-विदेश के अधिक से अधिक लोग इनके दर्शन कर सकें, इस उद्देश्य से इन्हें सार्वजनिक दर्शन के लिए रखने के संबंध में दिशा-निर्देश प्राप्त हुए हैं। कलेक्टर विश्वकर्मा के अनुसार, इस संबंध में नियमानुसार प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई है।