बुलंद सोच, सीहोर।

मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के 63 वर्षीय विवेक रुठिया इन दिनों सुर्खियों में हैं। उन्हें लगभग 109 साल पुराने प्रथम विश्व युद्ध के कर्ज (वॉर लोन) के दावे पर ब्रिटेन के ऋण प्रबंधन कार्यालय (DMO) से पहला आधिकारिक जवाब प्राप्त हुआ है।
विवेक रुठिया ने इसे एक बड़ी बात बताया है कि इतने सालों बाद ब्रिटेन की तरफ से प्रतिक्रिया आई है, और अब यह मामला पैसों से ज्यादा उनके सम्मान और अहम का बन गया है।
1917 का ऐतिहासिक कर्ज
यह पूरा मामला 4 जून 1917 के एक ऐतिहासिक प्रमाणपत्र से जुड़ा है, जिसे रुठिया परिवार ने एक सदी से भी अधिक समय से सहेज कर रखा है।
विवेक रुठिया के दादा सेठ जुम्मालल रुठिया ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश भारत सरकार को 35,000 रुपये का कर्ज दिया था। अंग्रेजों ने सैन्य खर्चों को पूरा करने के लिए व्यापारियों और धनवानों से यह कर्ज लिया था, जिस पर 5.5 प्रतिशत तय ब्याज देने का वादा किया गया था।
इस मूल दस्तावेज पर उस समय भोपाल के पॉलिटिकल एजेंट रहे डब्ल्यूएस डेविस के हस्ताक्षर मौजूद हैं। जुम्मालल रुठिया का निधन 1937 में हो गया था।
मूल दस्तावेजों की मांग
कई दशकों तक यह मामला ठंडे बस्ते में रहा था, लेकिन अब ब्रिटेन के ऋण प्रबंधन कार्यालय ने इस पर संज्ञान लिया है।
विवेक रुठिया ने जानकारी दी कि उनके वकील को हाल ही में ब्रिटिश अथॉरिटी की ओर से एक ईमेल प्राप्त हुआ है। इस आधिकारिक मेल में दावे की पुष्टि और आगे की प्रक्रिया के लिए मूल ऋण प्रमाणपत्र और इससे जुड़े अन्य दस्तावेजों की प्रतियां मांगी गई हैं।
सम्मान और अहम की लड़ाई
ब्रिटिश सरकार की ओर से मिले इस जवाब के बाद विवेक रुठिया बेहद उत्साहित हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें कभी उम्मीद नहीं थी कि इतने लंबे समय बाद उनके दावे पर कोई सुनवाई होगी या कोई जवाब आएगा, और उनका मानना है कि यह मामला अब अपने तार्किक निष्कर्ष तक जरूर पहुंचेगा।
उन्होंने स्पष्ट किया कि एक सदी से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद अब यह लड़ाई केवल पैसों की नहीं रह गई है, बल्कि यह उनके और उनके परिवार के अहम व आत्मसम्मान का विषय बन चुकी है।

