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2026-07-29

पद्म विभूषण तीजनबाई की कलात्मक विरासत मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय में संरक्षित होगी

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, भोपाल।

पंडवानी गायन को देश-दुनिया में नई पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण तीजनबाई की कलात्मक विरासत अब मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय में हमेशा के लिए संरक्षित की जाएगी। संस्कृति विभाग ने उनके जीवन, कला और उपलब्धियों से जुड़ी दुर्लभ स्मृतियों को सहेजने की प्रक्रिया तेज कर दी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके योगदान से परिचित हो सकें।
मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग ने उनकी स्मृतियों और रचनात्मक जीवन को स्थायी रूप से सहेजने की पहल शुरू की है। इसके तहत मध्य प्रदेश जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी उनके देश-विदेश में हुए प्रदर्शनों के आडियो-वीडियो, दुर्लभ तस्वीरें, पद्म पुरस्कारों की सनद, समाचार पत्रों और पत्रिकाओं की कतरनें तथा उनकी निजी वस्तुओं का विशेष संग्रह तैयार कर रही है।
अकादमी ने यह पहल तीजनबाई के जीवनकाल में ही शुरू की थी, लेकिन पिछले दिनों उनके निधन के बाद इसमें तेजी आई है। मई में रायपुर एम्स में उपचार के दौरान संग्रहालय की टीम ने उनसे संपर्क किया था। बेहद अस्वस्थ होने के कारण वह ठीक से बोल नहीं पा रही थीं, ऐसे में उनका यह ऐतिहासिक और संभवतः अंतिम साक्षात्कार आंखों की भाषा और हाथों के संकेतों के रूप में रिकॉर्ड किया गया।
अकादमी ने छत्तीसगढ़ के उनके पैतृक गांव गनियारी पहुंचकर उनके स्वजनों और शिष्यों के वीडियो साक्षात्कार दर्ज किए। उनके घर से दुर्लभ आडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग, तस्वीरें और अन्य स्मृति-चिह्न भी एकत्र किए गए।
मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय के क्यूरेटर अशोक मिश्रा के अनुसार, तीजनबाई अविभाजित मध्य प्रदेश की सबसे सशक्त जनजातीय लोक कलाकारों में से थीं। उन्होंने लोककला के क्षेत्र में पद्म विभूषण प्राप्त करने वाली पहली कलाकार के रूप में देश-विदेश में भारतीय लोक परंपरा को नई पहचान दिलाई। उनकी विरासत को सुरक्षित रखना केवल सांस्कृतिक दायित्व नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है।

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भोपाल से गहरा रिश्ता

तीजनबाई का भोपाल से गहरा रिश्ता रहा है। राजधानी में उनकी पहली प्रस्तुति 1983 में भारत भवन में हुई थी, जबकि अंतिम बार उन्होंने 2023 के लोकरंग महोत्सव में मंच संभाला था।
पुरुष प्रधान मानी जाने वाली पंडवानी परंपरा में उन्होंने महिलाओं की पारंपरिक बैठकर गाने वाली वेदमती शैली की सीमाएं तोड़ते हुए खड़े होकर तंबूरा हाथ में लेकर कापालिक शैली को नई पहचान दी। उन्होंने पंडवानी को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया।
पांच जुलाई 2026 को 70 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था।