बुलंद सोच, आमला।

माता-पिता के करीब दो वर्षों से चल रहे वैवाहिक विवाद के बीच 14 और 12 वर्ष के दो नाबालिग बच्चों ने अपने भविष्य और पारिवारिक जीवन को लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।
बच्चों की ओर से अधिवक्ता शिवम उपाध्याय ने न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, आमला के न्यायालय में घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम के तहत आवेदन प्रस्तुत किया है।
इस मामले में बच्चों की भावनाओं ने पारिवारिक विवाद के बीच यह अहम सवाल खड़ा किया है कि माता-पिता के विवाद की कीमत आखिर बच्चे क्यों चुकाएं। बच्चों की ओर से न्यायालय में रखी गई बातों में उनकी मां के प्रति गहरा लगाव सामने आया है।
बच्चों का कहना है कि वो हमारी मां हैं, हमारे बिना रह सकती हैं, हम मां के बिना नहीं रह सकते। उन्होंने प्रश्न किया, ‘माता-पिता का झगड़ा है, हमारा क्या दोष है?’ बच्चों ने कहा कि वे मां और पिता दोनों का प्यार और संरक्षण चाहते हैं। उनका अनुरोध है कि मां उनके साथ रहें और उनके पारिवारिक जीवन में किसी तीसरे व्यक्ति का हस्तक्षेप न हो।
अधिवक्ता से मिली जानकारी के अनुसार, पति-पत्नी के बीच करीब दो वर्षों से वैवाहिक विवाद चल रहा है। मां की ओर से तलाक की कार्यवाही न्यायालय में लंबित है, जबकि पिता की ओर से हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत पत्नी को साथ रखने के लिए याचिका दायर की गई है।
दोनों पक्षों की ओर से एक-दूसरे पर अलग-अलग आरोप लगाए गए हैं। इन आरोपों का निर्णय संबंधित न्यायालयों में साक्ष्यों के आधार पर होना है।
मामले की परिस्थितियों को देखते हुए बच्चों की ओर से अधिवक्ता शिवम उपाध्याय ने इंटरनेट मीडिया माध्यम से सूचना पत्र तामील किए जाने का अनुरोध न्यायालय के समक्ष रखा, जिसे न्यायालय ने स्वीकार किया है।
मामले में बच्चों की भावनाओं और उनके हित का पहलू भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अधिवक्ता अनिल पाठक और वरिष्ठ अधिवक्ता राजेंद्र उपाध्याय के अनुसार, कस्टडी और संरक्षकता से जुड़े मामलों में बच्चे का कल्याण सर्वोपरि माना जाता है।
संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 की धारा 17(3) के तहत यदि नाबालिग अपनी पसंद के संबंध में समझदारीपूर्ण राय बनाने की स्थिति में है, तो न्यायालय उसकी इच्छा पर विचार कर सकता है। हालांकि बच्चे की इच्छा अपने आप में अंतिम निर्णय का आधार नहीं होती।

