बुलंद सोच, भोपाल।
भोपाल के बड़ा तालाब (वेटलैंड) में अतिक्रमण और पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन के मामले में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने सरकार और संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है।
एनजीटी ने कहा कि करीब छह वर्षों से मामला लंबित होने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं होना कानून के शासन के प्रति अधिकारियों की उदासीनता को दर्शाता है।
राशिद नूर खान बनाम कलेक्टर भोपाल एवं अन्य की सुनवाई के दौरान एनजीटी ने कहा कि वर्ष 2020 से मामला न्यायाधिकरण के समक्ष है, लेकिन अब तक वेटलैंड क्षेत्र का सही सीमांकन और मापन तक नहीं हो सका।
सुनवाई के दौरान एनजीटी ने टिप्पणी की कि वेटलैंड क्षेत्र का सीमांकन नहीं होने से यह आशंका पैदा होती है कि प्रतिबंधित क्षेत्र में बने कुछ अवैध निर्माणों को संरक्षण देने की कोशिश की जा रही है।
न्यायाधिकरण ने इसे गंभीर विषय बताते हुए अधिकारियों से जवाब मांगा।
आवेदक की ओर से अधिवक्ता हर्षवर्धन तिवारी ने बताया कि कुछ छोटे अतिक्रमण तो हटाए गए हैं, लेकिन प्रभावशाली लोगों के बड़े अतिक्रमणों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
इस पर भोपाल नगर निगम ने स्वीकार किया कि वेटलैंड, निजी और शासकीय भूमि पर अतिक्रमण मौजूद हैं तथा कुछ मामलों में उच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश लागू हैं।
एनजीटी ने कहा कि उच्च न्यायालय के आदेशों का पालन जरूरी है, लेकिन इसके नाम पर अवैध निर्माणों को जारी नहीं रहने दिया जा सकता।
नगर निगम का दायित्व है कि वह प्रत्येक निर्माण की जांच करे कि वह वेटलैंड नियम-2017 के प्रतिबंधित क्षेत्र में है या नहीं।
एनजीटी ने भोपाल नगर निगम और कलेक्टर को निर्देश दिए हैं कि फुल टैंक लेवल (एफटीएल) और बफर जोन में स्थित सभी अतिक्रमणों पर कानून के अनुसार कार्रवाई कर उन्हें हटाया जाए तथा अगली सुनवाई से पहले विस्तृत प्रगति रिपोर्ट न्यायाधिकरण में पेश की जाए।
