बुलंद सोच, जबलपुर।

जबलपुर में कान की जटिल सर्जरी अब माइक्रोस्कोपिक, एंडोस्कोपिक और लेजर तकनीकों के उपयोग से अधिक सटीक और सुरक्षित हो गई है। इन आधुनिक तकनीकों के माध्यम से कान से लगातार मवाद आने, कान के पर्दे में छेद, बहरापन, ओटोस्क्लेरोसिस और वर्टिगो जैसी समस्याओं के वास्तविक कारणों की पहचान करना सरल हो गया है।
कार्यशाला का आयोजन एवं प्रशिक्षण
डॉ. विजयेंद्र के अनुसार, पूर्व में जटिल कान की सर्जरी में कई स्तरों पर चुनौतियाँ होती थीं। उन्होंने बताया कि आधुनिक उपकरणों ने सर्जनों को प्रभावित हिस्से को बेहतर ढंग से देखने, बीमारी के कारण की पहचान करने और ऑपरेशन की सटीक योजना बनाने में सहायता की है। कान से मवाद आने और वर्टिगो से संबंधित सर्जरी के जीवंत प्रदर्शन ने इसे कान की सर्जरी में एक महत्वपूर्ण तकनीकी बदलाव के रूप में रेखांकित किया। बेंगलुरु से आए डॉ. विजयेंद्र और डॉ. विनय ने कार्यशाला में मुख्य फैकल्टी के रूप में प्रशिक्षण प्रदान किया। यह कार्यक्रम ईएनटी विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. कविता सचदेवा के नेतृत्व में आयोजित किया गया। इसमें माइक्रोस्कोपिक तकनीक का उपयोग करते हुए फेशियल डिविएशन, कान के पर्दे के छेद, ओटोस्क्लेरोसिस, लगातार मवाद आने और वर्टिगो से संबंधित सर्जरी का जीवंत प्रदर्शन किया गया।
प्रशिक्षण में शामिल प्रतिभागी
रविवार को सुबह आठ बजे शुरू हुए विभिन्न सत्र आठ घंटे से अधिक समय तक चले, जिसमें तकनीकी प्रशिक्षण दिया गया। इस प्रशिक्षण में मेडिकल कॉलेज के 12 पीजी छात्रों सहित प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए 28 पीजी छात्रों ने कान की आधुनिक सर्जरी तकनीकों का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया। जबलपुर, विदिशा, भोपाल, उज्जैन, खंडवा, ग्वालियर और सागर सहित अन्य जिलों के 12 विशेषज्ञ ईएनटी सर्जन भी इन तकनीकी सत्रों में उपस्थित रहे।
लाइव सर्जरी और व्यावहारिक ज्ञान
कार्यशाला के दौरान, प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए आठ मरीजों में से छह की पहले दिन सफल सर्जरी की गई। इन मरीजों में कान से मवाद आने, कान के पर्दे में छेद और अनुवांशिक बहरापन सहित कान संबंधी अन्य विकार शामिल थे। विशेषज्ञों ने पीजी छात्रों और युवा सर्जनों को ऑपरेशन के दौरान तकनीक के उपयोग और बरती जाने वाली सावधानियों का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया।
ईयरफोन के उपयोग पर सलाह
डॉ. विनय ने युवाओं को ईयरफोन और ईयरबड्स के अत्यधिक उपयोग से बचने की सलाह दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इनका अनावश्यक और अधिक इस्तेमाल सुनने की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। कानों को स्वस्थ बनाए रखने के लिए इनके उपयोग को सीमित रखना आवश्यक है।
विशेषज्ञों के विचार
ईएनटी विभाग, मेडिकल कॉलेज की विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. कविता सचदेवा ने कहा कि यह कार्यशाला पीजी छात्रों और युवा ईएनटी सर्जनों के कौशल विकास के लिए अत्यंत उपयोगी है। उन्होंने बताया कि विशेषज्ञ ऑपरेशन के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों पर भी प्रकाश डाल रहे हैं, जिससे जोखिम कम करने और मरीज की रिकवरी बेहतर करने में सहायता मिलेगी। ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. विनय ने कहा कि ईयरफोन या ईयरबड्स का जितना कम इस्तेमाल किया जाए, कानों के लिए उतना ही बेहतर है, क्योंकि इनके अत्यधिक उपयोग से सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
कार्यशाला के मुख्य बिंदु
कार्यशाला एक तीन दिवसीय एडवांस्ड कैडेवरिक वर्कशॉप है। इसके पहले दिन का प्रशिक्षण आठ घंटे चला, जिसमें 40 पीजी छात्रों ने आधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण प्राप्त किया और 12 विशेषज्ञ ईएनटी सर्जन तकनीकी सत्रों में शामिल हुए। इस दौरान आठ में से छह मरीजों की सफल सर्जरी की गई। कार्यशाला का मुख्य ध्यान माइक्रोस्कोपिक सर्जरी, एंडोस्कोपिक तकनीक, लेजर तकनीक, कान के पर्दे के छेद की सर्जरी, ओटोस्क्लेरोसिस, वर्टिगो और कान से मवाद की समस्या के साथ-साथ सर्जरी के दौरान जोखिम कम करने की तकनीकों पर रहा।

