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2026-08-06

मध्य प्रदेश में 9 साल बाद छात्रसंघ चुनाव का रास्ता साफ

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, भोपाल।

मध्य प्रदेश में लगभग 9 साल बाद छात्रसंघ चुनाव का मार्ग प्रशस्त हो गया है। 2017 के बाद से प्रदेश में छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए थे। उच्च न्यायालय की सख्ती के बाद राज्य सरकार ने अदालत को सूचित किया है कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 में सितंबर माह में छात्रसंघ चुनाव कराए जाएंगे। सरकार के इस आश्वासन के पश्चात उच्च न्यायालय ने जनहित याचिका का निराकरण कर दिया।

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राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया

विभिन्न राजनीतिक दल इसे अपनी-अपनी लड़ाई की जीत बता रहे हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने उच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत करते हुए अकादमिक कैलेंडर और लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुरूप चुनाव कराने की मांग की है। वहीं, कांग्रेस और एनएसयूआई ने इसे वर्षों के आंदोलन तथा न्यायालय की सख्ती का परिणाम बताया है। मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता एवं पूर्व एनएसयूआई प्रदेश प्रवक्ता विवेक त्रिपाठी ने कहा कि छात्रसंघ चुनाव केवल प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नर्सरी हैं। उन्होंने बताया कि छात्र राजनीति से निकलकर कई नेताओं ने प्रदेश का नेतृत्व किया है। भाजपा के वर्तमान मुख्यमंत्री मोहन यादव छात्र राजनीति से आगे बढ़े हैं। वहीं, कांग्रेस में राजकुमार पटेल और मुकेश नायक जैसे नेताओं ने भी छात्र राजनीति से अपनी पहचान बनाई है। त्रिपाठी ने कहा कि छात्रसंघ सरकार और विद्यार्थियों के बीच एक सेतु का कार्य करता है। उनके अनुसार, यदि छात्रसंघ सक्रिय होते तो नीट परीक्षा जैसे विवादों में छात्रों की आवाज प्रभावी ढंग से सरकार तक पहुंच सकती थी। उनका आरोप है कि भाजपा सरकार ने हिंसा का हवाला देकर वर्षों तक छात्रसंघ चुनाव नहीं कराए, जबकि हिंसा तो लोकसभा, विधानसभा और पंचायत चुनावों में भी होती है।

'गेट वेल सून' आंदोलन और गिरफ्तारी

विवेक त्रिपाठी ने 2016-17 के आंदोलन का एक दिलचस्प किस्सा साझा किया। उन्होंने बताया कि उस समय तत्कालीन उच्च शिक्षा मंत्री जयभान सिंह पवैया से मिलने के कई प्रयास किए गए, परंतु मुलाकात नहीं हुई। इसके पश्चात फिल्म ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ से प्रेरणा लेकर ‘गेट वेल सून’ अभियान चलाया गया। त्रिपाठी ने बताया कि मंत्री के पीए के माध्यम से करीब 2.5 लाख ‘गेट वेल सून’ संदेश भेजे गए। इसके बाद भी सरकार नहीं मानी तो मंत्री निवास का घेराव किया गया। प्रदर्शन के दौरान लगभग 70-80 छात्र नेताओं को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। त्रिपाठी ने कहा कि यह उनके जीवन का पहला अवसर था जब उन्होंने जेल देखी। उन्होंने यह भी बताया कि जेल प्रशासन का व्यवहार सहयोगात्मक रहा क्योंकि सभी जानते थे कि छात्र अपनी वाजिब मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि अंततः सरकार नहीं, बल्कि उच्च न्यायालय की सख्ती के बाद सरकार को झुकना पड़ा।

छात्र राजनीति पर प्रभाव

त्रिपाठी ने कहा कि 9 साल तक छात्रसंघ चुनाव नहीं होने से प्रदेश की छात्र राजनीति लगभग समाप्त हो गई थी। उनके अनुसार, छात्र नेतृत्व तैयार होने की प्रक्रिया रुक गई और लोकतांत्रिक परंपरा कमजोर हुई। उन्होंने बताया कि इसी कारण जबलपुर के छात्र अदनान अंी द्वारा दायर जनहित याचिका के बाद उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा और सरकार को सितंबर 2026 में चुनाव कराने का आश्वासन देना पड़ा। भोपाल जिला एनएसयूआई अध्यक्ष अक्षय तोमर ने बताया कि उनका राजनीतिक जीवन भी 2016 के छात्र आंदोलन से प्रारंभ हुआ। उस समय छात्रों की छात्रवृत्ति और छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर हजारों विद्यार्थी सड़कों पर उतरे थे। उन्होंने कहा कि उस दौर में पूरे प्रदेश से छात्र नेता भोपाल पहुंचे थे। तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष विपिन वानखेड़े, विवेक त्रिपाठी और अन्य नेताओं के नेतृत्व में एक बड़ा आंदोलन हुआ। पुलिस ने बड़ी संख्या में छात्र नेताओं को गिरफ्तार किया, किंतु आंदोलन नहीं रुका। तोमर का कहना है कि उसी संघर्ष ने नई पीढ़ी को छात्र राजनीति से जोड़ा और उच्च न्यायालय के फैसले के रूप में उसका परिणाम सामने आया है। एबीवीपी ने उच्च न्यायालय के फैसले को विद्यार्थियों के लोकतांत्रिक अधिकारों की पुनर्स्थापना की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। संगठन के मध्य भारत प्रांत मंत्री केतन चतुर्वेदी ने कहा कि छात्रसंघ चुनाव विद्यार्थियों में नेतृत्व क्षमता, लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व विकसित करने का माध्यम हैं। एबीवीपी ने राज्य सरकार से अकादमिक कैलेंडर और लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुरूप पारदर्शी, निष्पक्ष और समयबद्ध चुनाव कराने की मांग की है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

मध्य प्रदेश में छात्रसंघ के प्रत्यक्ष चुनाव वर्ष 2003 में तत्कालीन भाजपा सरकार ने बंद कर दिए थे। इसके बाद वर्ष 2006 तक अप्रत्यक्ष प्रणाली से चुनाव कराए गए। इस प्रणाली में छात्र पहले अपनी कक्षा के प्रतिनिधि चुनते थे और वही आगे छात्रसंघ पदाधिकारियों का चुनाव करते थे। हालांकि, वर्ष 2006 में उज्जैन में छात्रसंघ चुनाव के दौरान प्रोफेसर एच.एस. सभरवाल की हत्या के बाद अप्रत्यक्ष चुनाव भी बंद कर दिए गए। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अक्षरदीप के अनुसार, 2017 के बाद सरकार ने पहले कोरोना महामारी और बाद में अन्य परिस्थितियों का हवाला देकर छात्रसंघ चुनाव नहीं कराए। इसके परिणामस्वरूप कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्रसंघों का गठन भी नहीं हो सका।