बुलंद सोच, इटारसी।
मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम (होशंगाबाद) जिले में स्थित ‘तिलक सिंदूर’ विश्व का एकमात्र ऐसा शिवालय है, जहाँ भगवान शिव का अभिषेक जल या दूध से नहीं, बल्कि सिंदूर से किया जाता है। सतपुड़ा की हरी-भरी वादियों में स्थित यह अलौकिक धाम इटारसी शहर से 16 किलोमीटर की दूरी पर घने जंगलों के बीच मौजूद है।
गोंड जनजाति और ‘बड़े देव’ से संबंध
इस मंदिर का ऐतिहासिक और आध्यात्मिक संबंध गोंड जनजाति से गहरा है। आदिवासी समुदाय में पूजा के दौरान सिंदूर का विशेष महत्व होता है और गोंड समाज के लोग भगवान भोलेनाथ को ‘बड़े देव’ के रूप में पूजते हैं। इतिहास के अनुसार, सतपुड़ा की पहाड़ियों पर पचमढ़ी से हरदा और टिमरनी तक गोंड राजाओं का शासन था। इन राजाओं ने ही यहाँ विशाल शिवलिंग की स्थापना की थी। प्राचीन परंपरा का पालन करते हुए, आज भी इस मंदिर में पहली पूजा का अधिकार आदिवासी समाज के प्रधान ‘भौमका’ परिवार को प्राप्त है।
पौराणिक मान्यताएं और ‘तिलक वन’ का उल्लेख
इस पवित्र स्थल से कई पौराणिक मान्यताएं भी जुड़ी हैं। एक मान्यता के अनुसार, जब भगवान शिव भस्मासुर से बचने के लिए भाग रहे थे, तब वे इसी क्षेत्र की गुफाओं और कंदराओं में छिपे थे। इसके बाद वे पचमढ़ी के पास स्थित जम्बूद्वीप गुफा की ओर निकले थे। नेपाल सीमा से आए प्रसिद्ध साधक कालिकानंद ब्रह्मचारी, जिन्हें स्थानीय लोग ‘बम बम बाबा’ कहते थे, ने यहाँ वर्षों तांत्रिक साधना की थी। उनका मानना था कि धार्मिक ग्रंथ ‘भवानी अष्टक’ में जिस ‘तिलक वन’ का उल्लेख है, वह वास्तव में यही तिलक सिंदूर धाम है।
श्मशान घाट और हंसगंगा नदी
इस धाम की एक और अनूठी विशेषता यह है कि भगवान भोलेनाथ का विशाल शिवलिंग जिस स्थान पर विराजित है, वहाँ आसपास के 15 आदिवासी गांवों का श्मशान घाट भी स्थित है। मंदिर के पास कल-कल बहती हंसगंगा नदी इसके वातावरण को और भी भक्तिमय बनाती है।
महाशिवरात्रि मेला और पहुँच मार्ग
महाशिवरात्रि पर यहाँ विशाल मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें प्रतिवर्ष 3 लाख से अधिक श्रद्धालु बाबा के दर्शन करने पहुँचते हैं। तिलक सिंदूर धाम पहुँचने के लिए, इटारसी से धरमकुंडी मार्ग पर 12 किलोमीटर दूर स्थित जमानी गांव जाना होगा। यहाँ से दक्षिण दिशा में सतपुड़ा के घने जंगलों के बीच 8 किलोमीटर का मार्ग तय करके इस पावन धाम तक पहुँचा जा सकता है।

