बुलंद सोच, भोपाल।
राज्य विधानसभा में सोमवार को समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक पेश हुआ। देश भर में इस पर चल रही बहस, समर्थन और विरोध के बीच उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ में अधिवक्ता शीराज कुरैशी की पुस्तक ‘इन सपोर्ट ऑफ यूसीसी-एमपी’ चर्चा में है। कुरैशी का दावा है कि यह पुस्तक संविधान की मूल भावना “हम भारत के लोग” और अनुच्छेद 44 के आलोक में यूसीसी की आवश्यकता तथा उससे जुड़े कानूनी पहलुओं को स्पष्ट करती है।
लेखक का परिचय और अध्ययन
अधिवक्ता कुरैशी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठन मुस्लिम राष्ट्रीय मंच और भारत फर्स्ट संगठन के पदाधिकारी हैं। कुरैशी के अनुसार, उन्होंने वर्ष 2006 से इस विषय पर अध्ययन किया है। यह पुस्तक देशभर में आयोजित 70 से अधिक बैठकों, वेबिनार और मुस्लिम बुद्धिजीवियों के साथ संवाद के आधार पर तैयार की गई है।
पुस्तक का उद्देश्य और सामग्री
उनका कहना है कि यह पुस्तक आम पाठकों, विधि के विद्यार्थियों और अधिवक्ताओं के लिए उपयोगी होगी। फिलहाल इसका अंग्रेजी संस्करण प्रकाशित हुआ है, जबकि हिंदी संस्करण शीघ्र आएगा। कुरैशी ने कहा कि संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में शामिल अनुच्छेद 44 को लागू करने का समय आ गया है। उनके अनुसार, यूसीसी सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान कर संवैधानिक समानता को मजबूत करेगा। इस पुस्तक में मुस्लिम समाज में यूसीसी को लेकर प्रचलित भ्रांतियों पर भी चर्चा की गई है। उन्होंने विवाह, तलाक, भरण-पोषण और उत्तराधिकार जैसे विषयों पर सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का भी उल्लेख किया है।
यूसीसी पर लेखक का दृष्टिकोण
कुरैशी का कहना है कि यूसीसी इस्लाम के धार्मिक सिद्धांतों से टकराता नहीं, बल्कि न्याय और समानता की अवधारणा को मजबूत करता है। कुरैशी स्वीकार करते हैं कि एक मुस्लिम होने के नाते यूसीसी के समर्थन में पुस्तक लिखना चुनौतीपूर्ण रहा। उनका उद्देश्य किसी धर्म या समुदाय का विरोध नहीं, बल्कि संवैधानिक दृष्टिकोण से विषय पर संवाद को आगे बढ़ाना और यूसीसी से जुड़ी गलतफहमियों को दूर करना है।
