बुलंद सोच, उज्जैन।

मध्य प्रदेश का उज्जैन कैंसर की दवाइयां बनाने का केंद्र बनने की ओर अग्रसर है। यहां के विक्रम उद्योगपुरी में कैंसर और हृदय से जुड़ी ऐसी दवाएं निर्मित की जा रही हैं, जो पूरे सेंट्रल इंडिया में कहीं और नहीं बनतीं। इन दवाओं को अब मध्य प्रदेश के बड़े शहरों के साथ-साथ गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों में भी भेजा जा रहा है। विक्रम उद्योगपुरी में स्थित वीआरएम मॉलिक्यूलर एंड न्यूक्लियर मेडिसिन प्राइवेट लिमिटेड कैंसर के साथ-साथ हृदय संबंधी दवाएं भी बना रहा है।
कैंसर जांच की विशेष दवाएं
उज्जैन इकाई में कैंसर की पूर्ण शरीर जांच के लिए एफडीजी (FDG), प्रोस्टेट कैंसर के लिए पीएसएमए (PSMA) और स्तन कैंसर की जांच में उपयोग होने वाली एफईएस (FES) दवा का उत्पादन भी शुरू हो गया है। ये दवाएं कैंसर स्कैनिंग में उपयोग की जा रही हैं।
हृदय ब्लॉकेज की तीन साल पहले पहचान
वीआरएम मॉलिक्यूलर एंड न्यूक्लियर मेडिसिन प्राइवेट लिमिटेड हृदय के लिए ऐसी दवाएं बना रहा है, जिनकी मदद से तीन साल पहले ही हृदय में होने वाले ब्लॉकेज का पता लगाया जा सकता है। परियोजना प्रबंधक रियाज खान ने बताया कि हृदय के लिए एनएच-3 अमोनिया टेस्ट किया जाता है, जिससे हृदय का डिटेक्शन और कैलकुलेशन होता है। इससे यह पता चलता है कि अगले तीन साल में हृदय की किस नस में ब्लॉकेज आ सकता है। यह एक तरह से अगले तीन साल का भविष्य पूर्वानुमान करता है।
रात में दवा निर्माण और रेडिएशन सुरक्षा
कैंसर की दवाएं रात में ही तैयार की जाती हैं, जिन्हें सुबह तेजी से मरीजों तक पहुंचाया जाता है। दवा बनते ही उसकी क्षमता लगातार कम होने लगती है, यह हर दो से चार घंटे में आधी होती जाती है और अगले चार घंटे बाद ग्लूकोज के रूप में बदल जाती है। परियोजना प्रबंधक रियाज खान ने बताया कि दवा मरीज की दूरी के हिसाब से दी जाती है। अधिक दूरी होने पर 30 से 50 एमसीआई (MCI) तक की दवा भेजी जाती है, ताकि मरीज तक पहुंचने पर 10 एमसीआई दवा प्रभावी रूप में बची रहे और कैंसर की सही पहचान हो सके। कैंसर की दवाइयों के निर्माण में सबसे बड़ा खतरा रेडिएशन का होता है, जो शरीर के लिए काफी नुकसानदायक होता है। इसके चलते उज्जैन संयंत्र में 50 कर्मचारियों के साथ रोबोट भी काम कर रहे हैं। दवा बनाने और उसे ले जाने में रेडिएशन का सबसे बड़ा खतरा होता है, जिसके लिए विशेष वाहन तैयार किए गए हैं। दवा बनते ही रात में ही वाहन से अस्पताल भेज दी जाती है और इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि दवा ले जाते समय ड्राइवर रेडिएशन की चपेट में न आए। मरीज के कैंसर का पता लगाने के लिए उसे पहले भूखा रखा जाता है, और सुबह उसकी जांच सही तरीके से हो सके व उसे कोई परेशानी न हो, इसके लिए इकाई में पूरी रात काम कर सुबह तक दवाएं अस्पताल पहुंचा दी जाती हैं।

अत्याधुनिक तकनीक और संयंत्र
मध्य प्रदेश औद्योगिक विकास निगम (MPIDC) के विशेष सहयोग से विक्रम उद्योगपुरी में 3 नवंबर 2025 को शुरू हुए वीआरएम के 4 एकड़ के संयंत्र में मार्च 2026 से कैंसर की दवाइयों का उत्पादन शुरू हो गया था। रियाज खान ने दावा किया कि वीआरएम के पास देश की सबसे आधुनिक तकनीक उपलब्ध है, जिसमें भारत का अत्याधुनिक साइक्लोट्रॉन शामिल है, जिसका उपयोग वर्तमान में किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि यह सेंट्रल इंडिया की पहली साइक्लोट्रॉन साइट है। साइक्लोट्रॉन एक प्रकार का न्यूक्लियर रिएक्टर होता है, जो न्यूक्लियर मेडिसिन तैयार करने में उपयोग किया जाता है। वीआरएम के पास मौजूद रोबोट भी भारत का पहला ऐसा रोबोट है, जो इस तकनीक के साथ काम कर रहा है और फिलहाल किसी अन्य साइट पर इस तरह का रोबोट उपलब्ध नहीं है। इसकी मदद से दवाइयों के निर्माण में बेहद सटीक परिणाम प्राप्त हो रहे हैं। जल्द ही उज्जैन में भी कैंसर डिटेक्शन के लिए वीआरएम संयंत्र में टेस्टिंग यूनिट शुरू होगी।
मध्य प्रदेश में कैंसर दवाओं के दाम बढ़े
मध्य प्रदेश में अब कैंसर मरीजों के इलाज का खर्च 50 प्रतिशत तक बढ़ गया है। इससे एक कीमोथेरेपी का खर्च 2 से 3 हजार रुपए ज्यादा लगेगा। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने कैंसर के इलाज में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली दो प्रमुख कीमोथेरेपी दवाओं कार्बोप्लाटिन और सिस्प्लाटिन के दाम बढ़ा दिए हैं।

