बुलंद सोच, भोपाल।

टीबी की एक ऐसी किस्म होती है जिस पर सामान्य दवाएं असर नहीं करतीं, इसे दवा-प्रतिरोधी टीबी या एमडीआर-टीबी कहा जाता है। इस बीमारी के इलाज में सबसे बड़ी चुनौती यह पता लगाना होता है कि मरीज पर कौन सी दवा प्रभावी रहेगी। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल के डॉक्टरों ने इस समस्या का समाधान खोजने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है। एम्स भोपाल के विशेषज्ञों ने जीनोटाइप एमटीबीडीआरएसएल नामक एक नया टेस्ट विकसित किया है। इस टेस्ट की मदद से एमडीआर-टीबी में दवा प्रतिरोध का पता केवल दो दिन में लगाया जा सकेगा, जिससे मरीज का इलाज सही दवा के साथ जल्द शुरू करने में मदद मिलेगी।
पूर्व की स्थिति और नए टेस्ट के लाभ
पहले एमडीआर-टीबी में यह पता लगाने में चार से छह सप्ताह तक का समय लग जाता था कि कौन सी दवा मरीज पर असर करेगी। रिपोर्ट आने तक डॉक्टरों को कई बार अनुमान के आधार पर इलाज शुरू करना पड़ता था। ऐसी स्थिति में यदि दवा प्रभावी नहीं हुई तो मरीज की हालत बिगड़ने का खतरा रहता था। एम्स भोपाल के माइक्रोबायोलॉजी, पल्मोनरी मेडिसिन और ट्रांसलेशनल मेडिसिन विभाग के विशेषज्ञों ने इस चुनौती को ध्यान में रखते हुए यह नया टेस्ट विकसित किया है। अध्ययन का नेतृत्व डॉ. आनंद कुमार मौर्य ने किया।
अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष
अध्ययन के दौरान 74 एमडीआर-टीबी मरीजों पर जीनोटाइप एमटीबीडीआरएसएल टेस्ट किया गया। जांच में सामने आया कि 19 प्रतिशत मरीजों में फ्लोरोक्विनोलोन नाम की दवा काम नहीं कर रही थी। डॉक्टरों द्वारा एमडीआर-टीबी के उपचार में इन दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है। राहत की बात यह रही कि अध्ययन में किसी भी मरीज में इंजेक्शन वाली दवाओं एमिकासिन और कनामाइसिन के खिलाफ प्रतिरोध नहीं मिला, इसका अर्थ है कि इन दवाओं का असर मरीजों में बना हुआ था। विशेषज्ञों ने पाया कि फ्लोरोक्विनोलोन के काम नहीं करने की वजह टीबी के कीटाणु के जीआर-ए जीन में बदलाव है। नए टेस्ट के जरिए इस तरह के आनुवंशिक बदलाव की पहचान की जा सकती है, जिससे डॉक्टरों को इलाज के लिए उपयुक्त दवा चुनने में मदद मिलेगी। यह रिसर्च वाइली ऑनलाइन लाइब्रेरी के मेडिकल जर्नल में भी प्रकाशित हुई है।
सरकारी कार्यक्रम में शामिल करने की आवश्यकता
एम्स भोपाल के डॉ. आनंद कुमार मौर्य के अनुसार, पहले रिपोर्ट आने में कई सप्ताह लग जाते थे, लेकिन अब सिर्फ दो दिन में यह पता लगाया जा सकेगा कि मरीज के लिए कौन सी दवा प्रभावी रहेगी। इससे इलाज सही दिशा में जल्द शुरू किया जा सकेगा, मरीज के जल्दी ठीक होने के साथ संक्रमण को दूसरे लोगों तक फैलने से रोकने में भी मदद मिलेगी। डॉ. मौर्य का कहना है कि यदि इस टेस्ट को सरकारी टीबी कार्यक्रम में शामिल किया जाता है, तो गरीब मरीजों को भी समय पर सही उपचार मिल सकेगा।
मध्य प्रदेश में टीबी की स्थिति
मध्य प्रदेश टीबी के मामलों के लिहाज से हाई-बर्डन वाला राज्य है। एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में लगभग 1.76 लाख टीबी मरीज हैं। आदिवासी क्षेत्रों में टीबी संक्रमण अधिक है। आदिवासी आबादी में टीबी के मामलों के लिहाज से मध्य प्रदेश देश में दूसरे नंबर पर है।
टेस्ट की कार्यप्रणाली
जीनोटाइप एमटीबीडीआरएसएल टेस्ट में मरीज के कफ या दूसरे नमूने से टीबी के कीटाणु का डीएनए निकाला जाता है। इसके बाद मशीन के जरिए यह जांच की जाती है कि दवा से संबंधित जीन में कोई गड़बड़ी या बदलाव तो नहीं है। खास बात यह है कि इस जांच के लिए बहुत महंगी मशीन की आवश्यकता नहीं है और इसे सरकारी लैब में भी आसानी से किया जा सकता है।

