BREAKING NEWS
2026-07-24

अर्लिंग हालेंड की सफलता में ‘पॉजिटिव सेल्फ टॉक’ अहम, विज्ञान भी मानता है प्रभावी

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच।

हालिया फुटबॉल वर्ल्ड कप में नॉर्वे के अर्लिंग हालेंड सात गोल दागकर टूर्नामेंट के चौथे सबसे सफल खिलाड़ी रहे। उनकी 6 फुट 5 इंच की लंबाई के साथ-साथ फुर्ती और फिटनेस भी चर्चा का विषय रही।
हालेंड के इस शानदार प्रदर्शन का राज केवल उनकी शारीरिक ताकत नहीं, बल्कि उनकी जबरदस्त मानसिक मजबूती है।

Advertisement

हाइपोक्सिक चैंबर का अनुभव और हालेंड का सिद्धांत

पिछले साल मैनचेस्टर सिटी की ट्रेनिंग फैसिलिटी में हालेंड एक ‘हाइपोक्सिक चैंबर’ में एक्सरसाइज बाइक चला रहे थे, यह एक ऐसा कमरा होता है जहां पहाड़ों जैसी ऊंचाई और तेज गर्मी का माहौल बनाकर हवा में ऑक्सीजन काफी कम कर दी जाती है।
इस दौरान हालेंड को पूरी ताकत लगाकर अपना हार्ट रेट 150 बीट्स प्रति मिनट तक ले जाना था। उन्होंने कैमरे की तरफ देखते हुए कहा था कि वह यह बिल्कुल नहीं करना चाहते, लेकिन फिर भी करेंगे क्योंकि यह उनके शरीर और दिमाग दोनों के लिए अच्छा है।
हालेंड का खुद को थकावट की सीमा से आगे ले जाने का तरीका बेहद असरदार है। उनका मानना है कि अगर आप खुद से कहेंगे कि आप थक गए हैं, तो आप सच में थक जाएंगे।
इसके विपरीत, अगर आप खुद से कहेंगे कि ‘मैं इतना भी नहीं थका हूं, सब ठीक है,’ तो आपको थकान महसूस नहीं होगी। उनका सीधा सा सिद्धांत है कि हमारे शरीर में हमारी सोच से कहीं ज्यादा सहने की ताकत होती है और यह सब सिर्फ दिमाग का खेल है।

पॉजिटिव सेल्फ-टॉक का वैज्ञानिक आधार

बास्केटबॉल सुपरस्टार लेब्रोन जेम्स और अमेरिकी फुटबॉल के दिग्गज टॉम ब्रैडी जैसे चैम्पियन खिलाड़ी भी इसी सोच के साथ मैदान में उतरते रहे हैं।
सालों से खेल मनोवैज्ञानिक भी मानते आए हैं कि खुद से सकारात्मक बातें करना (पॉजिटिव सेल्फ-टॉक) एक बेहतरीन टूल है, और अब विज्ञान भी इसी बात का समर्थन करता है।
वेल्स की बांगोर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जेम्स हार्डी और उनके साथियों द्वारा 2014 में किए गए एक शोध के नतीजे बताते हैं कि एथलीट इसलिए हार नहीं मानते क्योंकि उनकी मांसपेशियों की ताकत खत्म हो जाती है, बल्कि वे इसलिए रुकते हैं क्योंकि उनका दिमाग मान लेता है कि अब दर्द या मेहनत बर्दाश्त से बाहर है।
इस शोध में कुछ युवाओं को साइकिल चलाने को कहा गया, जिसमें जिस समूह ने एक्सरसाइज के दौरान खुद से सकारात्मक बातें कीं, उनकी क्षमता में 18 प्रतिशत का सुधार देखा गया। दिलचस्प बात यह थी कि उनकी हार्ट रेट और शारीरिक मेहनत में कोई बदलाव नहीं हुआ था, लेकिन खुद से अच्छी बातें करने की वजह से उन्हें वह काम आसान लगा।

व्यक्तिगत अनुप्रयोग और सुझाव

हालेंड जब भी मैदान पर थकते हैं, तो खुद से बस यही कहते हैं कि ‘मैं थका नहीं हूं।’
यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के मनोवैज्ञानिक एथन क्रॉस के शोध के अनुसार, खुद से बात करते समय किसी दूसरे व्यक्ति की तरह (जैसे ‘तुम’ कहकर) बात करना और भी ज्यादा फायदेमंद होता है।
इसलिए, अगर आप भी चैम्पियन जैसी एनर्जी पाना चाहते हैं, तो अगली बार जब आप दौड़ते हुए, जिम में, या ऑफिस का काम करते हुए थकने लगें, तो खुद से बस यही कहें कि ‘तुम थके नहीं हो।’