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2026-08-02

26 साल बाद भी बाघों की संख्या में मामूली अंतर, गणना पद्धति पर सवाल

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, भोपाल।

देश में बाघों की संख्या को लेकर पिछले दो दशकों के आंकड़ों से एक नई बहस छिड़ गई है। वर्ष 2010 में संसद में सरकार ने एक जवाब में बताया था कि वर्ष 2001-02 में राज्यों की ओर से पगमार्क (पंजों के निशान) पद्धति के आधार पर देश में 3,642 और मध्य प्रदेश में 710 बाघ थे।
वहीं, वर्ष 2022 की ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन में देश में बाघों की औसत संख्या 3,682 और मध्य प्रदेश में 785 दर्ज की गई। यह गणना कैमरा ट्रैप, डीएनए, साइन सर्वे और वैज्ञानिक विश्लेषण जैसी आधुनिक तकनीकों से की गई है।
इस प्रकार, 26 साल के अंतराल में देशभर में बाघों की संख्या में केवल 40 और मध्य प्रदेश में 75 का अंतर दिखाई देता है।
हालांकि, दोनों आंकड़ों की गणना पद्धति अलग-अलग है, इसलिए इनकी सीधी तुलना करना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं माना जाता है। वर्ष 2006 से भारत में पगमार्क पद्धति की जगह वैज्ञानिक ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन लागू किया गया है, जिसे अधिक विश्वसनीय माना जाता है।
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि यह तुलना एक अहम सवाल खड़ा करती है कि क्या पगमार्क पद्धति से बाघों की संख्या का अनुमान वास्तविकता से अधिक था, या फिर आज भी संरक्षण की बड़ी चुनौतियों के कारण बाघों की संख्या अपेक्षित गति से नहीं बढ़ पा रही है।

संरक्षण प्रयासों और व्यय पर सवाल

भारत सरकार बाघों की संख्या में हर साल छह प्रतिशत की वृद्धि मानकर चल रही है। ऐसे में बाघों की संख्या में बढ़ोतरी के बजाए यह मामूली अंतर कई सवाल खड़े कर रहा है।
वहीं, यदि बाघों की मौत के आंकड़े राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) की वेबसाइट पर देखें तो 2012 से 2026 के बीच 1700 से ज्यादा मौतें दर्ज की गई हैं।
बाघ परियोजना पर सरकार हर साल औसतन 100 करोड़ रुपये खर्च करती है, इस हिसाब से यह आंकड़ा पिछले 26 साल में 2500 करोड़ रुपये से ज्यादा का हो जाता है।

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गणना पद्धतियों में अंतर

पगमार्क पद्धति एक पुरानी विधि है, जिसमें जंगल में मिले बाघ के पंजों के निशान देखकर उनकी संख्या का अनुमान लगाया जाता था। इसमें एक ही बाघ के निशान कई बार गिने जाने या अलग-अलग बाघों के निशान में भ्रम की संभावना रहती थी।
कैमरा ट्रैप एक आधुनिक पद्धति है, जिसमें जंगल में विशेष कैमरे लगाए जाते हैं, जो बाघ की तस्वीर अपने आप खींच लेते हैं। हर बाघ के शरीर पर बनी धारियां अलग होती हैं, इसलिए फोटो के आधार पर उसकी सही पहचान और गिनती करना अधिक सटीक माना जाता है।

बाघों की संख्या: वर्षवार आंकड़े

सरकार के जवाब और एनटीसीए की वेबसाइट के अनुसार बाघों की संख्या वर्षवार इस प्रकार है:
वर्ष 2001-02 में 3,642 बाघ (पगमार्क पद्धति से)।
वर्ष 2006 में 1,411 बाघ (नई वैज्ञानिक पद्धति से)।
वर्ष 2010 में 1,706 बाघ।
वर्ष 2014 में 2,226 बाघ।
वर्ष 2018 में 2,967 बाघ।
वर्ष 2022 में 3,682 बाघ।

विशेषज्ञों और अधिकारियों की प्रतिक्रिया

मध्य प्रदेश के वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे का कहना है कि इस सवाल का जवाब केवल एक विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण से ही मिल सकता है। उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट है कि बाघों के आंकड़े बताते हैं कि पहले और वर्तमान गणना की विश्वसनीयता नहीं है। इसकी विश्वसनीयता बताने के लिए उच्च स्तरीय मापदंड स्थापित होने चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि यह लोकसभा प्रश्न का जवाब है, सरकार को जवाब देना चाहिए।
वहीं, भारत सरकार के वन मंत्रालय के एडीजी वाइल्डलाइफ सुशील कुमार अवस्थी का कहना है कि उनके आंकड़े गलत नहीं हैं। उन्होंने बताया कि वे वर्ष 2010 से बाघों की गणना कर रहे हैं और उनके आंकड़े सेंट पीटर्सबर्ग डिक्लेरेशन के समय के हैं। अवस्थी ने वर्ष 2001-02 के आंकड़ों की जानकारी होने से इनकार किया।