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दतिया उपचुनाव: नरोत्तम मिश्रा का राजनीतिक भविष्य तय करेगा परिणाम

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, भोपाल।

मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट के उपचुनाव के लिए गुरुवार को मतदान संपन्न हुआ। शाम छह बजे मतदान समाप्त होने तक 71.44 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। इस चुनाव में मतदाताओं ने नया विधायक चुनने के साथ ही यहां से तीन बार विधायक रहे प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का राजनीतिक भविष्य भी तय किया है।

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उपचुनाव का कारण और प्रत्याशी

दतिया सीट पर यह उपचुनाव कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता रद्द होने के कारण हुआ है। राजेंद्र भारती ने 2023 के विधानसभा चुनाव में डॉ. नरोत्तम मिश्रा को पराजित किया था। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस उपचुनाव के लिए आशुतोष तिवारी को अपना प्रत्याशी घोषित किया है।

मिश्रा की भूमिका पर परिणाम का असर

भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी की जीत या हार, दोनों ही डॉ. नरोत्तम मिश्रा की पार्टी और संगठन में आगामी भूमिका निर्धारित करेगी। पिछले चुनाव में हारने के बाद, मिश्रा ने यह सीट रिक्त होते ही उपचुनाव की तैयारी शुरू कर दी थी। हालांकि, भाजपा ने आशुतोष तिवारी को टिकट दिया, जिसके बाद उनके समर्थकों ने धरना-प्रदर्शन भी किया, लेकिन मिश्रा पार्टी लाइन से बाहर नहीं गए।

जीत-हार की स्थिति में राजनीतिक समीकरण

यदि भाजपा को जीत मिलती है, तो डॉ. नरोत्तम मिश्रा के समर्थन की पुष्टि होगी। वहीं, यदि पार्टी हारती है, तो इसे उनके समर्थकों के विरोध का परिणाम माना जा सकता है। हालांकि, दोनों ही स्थितियों में जनाधार वाले नेता नरोत्तम मिश्रा को राजनीतिक नुकसान कम ही होने का अनुमान है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दतिया में भाजपा की जीत नरोत्तम के लिए मुख्यधारा की राजनीति या संगठन में एक नई भूमिका के रास्ते खोल सकती है।

भविष्य की संभावनाएं और पार्टी में स्थिति

पार्टी के जानकार बताते हैं कि आने वाले 2028 के विधानसभा चुनाव में उन्हें कहीं न कहीं समायोजित करना ही होगा, अन्यथा आसपास की कई सीटों पर प्रभाव पड़ सकता है। चुनाव परिणाम मतगणना के बाद तीन अगस्त को घोषित किए जाएंगे।

मिश्रा का जीत का दावा और चुनौती

डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने खुद मतदान करने के बाद दावा किया है कि भाजपा यह चुनाव 20 हजार से अधिक वोटों के अंतर से जीतेगी। यदि नतीजा इसके विपरीत आता है, तो उनके गढ़ में उनकी राजनीतिक पकड़ पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं। यही वजह है कि इस चुनाव को कांग्रेस बनाम भाजपा से ज्यादा नरोत्तम के वजूद की लड़ाई के रूप में देखा गया है।

कार्यकर्ताओं पर दबदबा और केंद्रीय नेतृत्व से पहुंच

चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने स्थानीय प्रशासन और पुलिस को भी सख्त चेतावनी दी थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वे कार्यकर्ताओं के बीच अपना दबदबा बनाए रखना चाहते हैं। नरोत्तम मिश्रा भाजपा के उन चुनिंदा राज्य स्तरीय नेताओं में से हैं, जिनकी केंद्रीय नेतृत्व और संघ के बड़े पदाधिकारियों तक सीधी पहुंच रही है। समय-समय पर उनकी दिल्ली दौड़ और शीर्ष नेताओं से मुलाकातें दर्शाती हैं कि संगठन में उन्हें पूरी तरह हाशिए पर नहीं धकेला गया है।