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2026-08-10

पेड़ नहीं, पानी लगाने का समय आ गया: डॉ. अनिल प्रकाश जोशी

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, इंदौर।

पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने कहा कि हमने प्रकृति के विज्ञान को नहीं पढ़ा है। उन्होंने बताया कि मानसून प्रकृति का अपना प्रबंधन था।
डॉ. जोशी के अनुसार, अब पेड़ लगाने का जमाना जा चुका है, हमें पानी लगाना होगा। उन्होंने नदियों को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जब नदी में पानी आता है तो सबकुछ लौटकर आता है।
डॉ. जोशी ने उत्तराखंड की एक नदी को जीवित करने का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां दो सौ वाटर होल बनाए गए और वर्षा जल उनमें जमा किया गया। इसके परिणामस्वरूप अगले वर्ष ही नदी का पानी बढ़ गया।
नदी में पानी बढ़ने के साथ ही आस-पास पेड़ भी उगना शुरू हो गए और कई जीवों ने जंगल को अपना ठिकाना बनाना शुरू कर दिया।
उन्होंने बताया कि कई बार उत्तराखंड के अन्य वन्य क्षेत्रों में आग लग जाती है, लेकिन उस स्थान पर आग नहीं लगती, क्योंकि जमीन में नमी बनी रहती है।
ये बातें पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने सेवा सुरभि द्वारा आयोजित ‘क्यों रूठ जाती है प्रकृति’ विषय पर संबोधित करते हुए कहीं।

देशव्यापी जल संकट और भारत की स्थिति

डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने कहा कि आज कम होते पानी की समस्या सिर्फ इंदौर की नहीं है, बल्कि यह देशभर की समस्या बन चुकी है।
उन्होंने इसे एक अच्छी बात बताया कि भारत ट्रॉपिकल कंट्री में आता है।
डॉ. जोशी ने कहा कि आज फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों की हालत खराब हो चुकी है। उन्होंने जोड़ा कि यदि हम ट्रॉपिकल कंट्री में नहीं होते तो 46 डिग्री का तापमान नहीं झेल पाते।
डॉ. जोशी ने उल्लेख किया कि भारत अब एग्रेसिव इकोनॉमी की ओर जा रहा है। उन्होंने जोर दिया कि आप किसी भी देश या धर्म के हों, लेकिन प्रकृति सिर्फ एक ही है और हमें प्रकृति को स्वीकार करना ही होगा।
उन्होंने कहा कि एक समय यूरोप स्वर्ग हुआ करता था, लेकिन आज नर्क बन चुका है।

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बदलते मौसम और मानवीय हस्तक्षेप

डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने प्रकृति के विज्ञान को पढ़ने की आवश्यकता दोहराई।
उन्होंने कहा कि हम आज यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि हम कौन से मौसम की ओर जा रहे हैं। फरवरी में मई-जून जैसी गर्मी पड़ रही है और वर्षा भी समय से पहले हो जाती है।
डॉ. जोशी ने बताया कि हमने सब बिखेर दिया है और हमें अब अपने अंदर झांककर देखना होगा। उन्होंने कहा कि हमने मानसून की दशा और दिशा दोनों बदल दी है।
उन्होंने सुझाव दिया कि इंदौर को भी रीमैपिंग की जरूरत है, क्योंकि यहां से काफी कुछ जा चुका है। ऐसे में जो जा चुका है, उसे वापस लाने के प्रयास करने होंगे और प्रकृति के विज्ञान को पढ़ना होगा।

मानव इतिहास और कृषि का प्रभाव

डॉ. जोशी ने बताया कि 70 हजार साल पहले मानव भी जानवर हुआ करता था। बाद में होमो सेपियंस अलग हो गए और अफ्रीका से विभिन्न देश होते हुए अंत में अमेरिका पहुंचे।
इस दौरान होमो सेपियंस ने अपनी बुद्धि का उपयोग करना भी शुरू कर दिया। डॉ. जोशी के अनुसार, मानव ने दस हजार साल पहले खेती की शुरुआत की और यही सबसे बड़ा फ्रॉड था।
उन्होंने कहा कि हम खेती के ट्रैप में फंस चुके हैं। हमने जंगल काटे, जानवरों को मारा और एक प्रकार से सीरियल किलर हो चुके हैं।
डॉ. जोशी ने उदाहरण दिया कि दुनिया में बीस हजार जिराफ ही बचे हैं, जबकि कैटल्स की संख्या दो बिलियन है, क्योंकि हमें इनकी आवश्यकता है।
इसी तरह, वॉल्फ भी बहुत कम बचे हैं, लेकिन पालतू कुत्तों की संख्या 400 मिलियन पार हो गई। उन्होंने कहा कि हमें जिसकी जरूरत थी, हमने उनकी संख्या बढ़ाई।

विकास, प्रदूषण और प्राकृतिक बुद्धिमत्ता

डॉ. जोशी ने कहा कि दुनिया बदल चुकी है और हम विकास को नहीं रोक सकते। उन्होंने यह भी कहा कि अब आदमी की आदमी से लड़ाई चल रही है और जान बचाने का समय है।
उन्होंने कहा कि हम इतने इंटेलिजेंट हो गए कि इंटेलिजेंस को आर्टिफिशियल बना लिया। उन्होंने नेचुरल इंटेलिजेंस पर काम करने की आवश्यकता पर बल दिया।
डॉ. जोशी ने बताया कि हमने पिछले तीस से चालीस सालों में जंगल बनाने के प्रयास किए, लेकिन कहीं जंगल नहीं बस पाया।
उन्होंने कहा कि जितना ज्यादा पानी होगा, उतना प्रदूषण कम होगा।
पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने नईदुनिया से चर्चा में कहा कि पहाड़ों पर आने वाले पर्यटकों की संख्या को नियंत्रित करना होगा।