बुलंद सोच, जबलपुर।
जबलपुर हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल व न्यायमूर्ति अवनींद्र कुमार सिंह की युगलपीठ ने हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे एक पिता और उसके दोनों बेटों को दोषमुक्त कर दिया है।
इस मामले में एक बेटा जितेंद्र यादव वारदात के समय झांसी के अस्पताल में भर्ती था, इसके बावजूद उसे करीब 10 साल छह महीने जेल में रहना पड़ा।
हाई कोर्ट ने अपीलों पर सुनवाई के दौरान अभियोजन की कहानी में कई महत्वपूर्ण विसंगतियां पाईं, जिसके आधार पर यह निर्णय लिया गया।
अभियोजन के अनुसार, 13 नवंबर 2015 को राजेंद्र यादव अपने बेटों सत्येंद्र और जितेंद्र तथा तीन अज्ञात लोगों के साथ लाइसेंसी बंदूक, तलवार, फरसा और लाठी लेकर परमानंद यादव के घर पहुंचा था।
आरोप था कि आरोपियों ने हमला किया, जिसमें परमानंद की मौत हो गई और परिवार के अन्य सदस्य घायल हुए।
निवाड़ी की अदालत ने राजेंद्र, सत्येंद्र और जितेंद्र तीनों को विभिन्न धाराओं में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
हाई कोर्ट ने पाया कि चार्जशीट में तीन अज्ञात आरोपियों के संबंध में धारा 173(8) के तहत आगे की जांच का उल्लेख नहीं था।
ऐसे में धारा 147, 148, 302/149 और 323/149 के तहत आरोप तय किए जाने पर भी सवाल उठता है।
शिकायतकर्ता और अन्य गवाहों के बयानों में विरोधाभास पाए गए।
पांच घायल गवाहों की मेडिकल रिपोर्ट रिकॉर्ड में होने के बावजूद, अभियोजन उन्हें कोर्ट में साबित नहीं कर सका।
पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर के सामने कथित हथियार भी पेश नहीं किए गए।
डॉक्टर ने जिरह में यह स्वीकार किया कि चोटों से यह राय नहीं दी गई थी कि मृत्यु हत्या के कारण हुई थी, बल्कि चोट पत्थर या सड़क के गड्ढे में गिरने से भी संभव थी।
जितेंद्र के अस्पताल में भर्ती होने की पुष्टि डॉक्टर, नर्स और वार्ड ब्वाय ने की थी।
सत्येंद्र के शरीर पर भी तीन चोटें मिली थीं, जबकि राजेंद्र ने घटना के समय खेत में सिंचाई करने की बात कही थी।
कस्टडी रिपोर्ट के अनुसार, सत्येंद्र दो साल 10 महीने पांच दिन, राजेंद्र एक साल आठ माह दो दिन और जितेंद्र 10 साल 6 महीने से जेल में थे।
कोर्ट ने तीनों को दोषमुक्त कर दिया और जितेंद्र को किसी अन्य मामले में आवश्यकता न होने पर तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया।

