बुलंद सोच, जबलपुर।
जबलपुर। हाई कोर्ट ने जाति प्रमाण-पत्र की वैधता से जुड़े एक विवाद में 21 साल पुराने एकलपीठ के आदेश को निरस्त कर दिया है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने यह महत्वपूर्ण आदेश दिया। युगलपीठ ने कहा कि जब संबंधित कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुका है, तब इतने लंबे अंतराल के बाद हाई पावर कमेटी से जांच कराने का कोई उपयोगी उद्देश्य नहीं रह जाता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि विभागीय जांच में उस कर्मचारी का जाति प्रमाण-पत्र पहले ही वैध पाया जा चुका है।
यह मामला मंडला निवासी अपीलकर्ता महेंद्र सिंह ठाकुर से संबंधित था। उनके खिलाफ अवैध जाति प्रमाण-पत्र के आधार पर नौकरी प्राप्त करने की शिकायत हुई थी।
वर्ष 2005 में एकलपीठ ने इस मामले को राज्य सरकार की हाई पावर कमेटी के समक्ष जांच के लिए भेजने का निर्देश दिया था।
महेंद्र सिंह ने एकलपीठ के इस निर्देश के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।
अपील की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि विभिन्न विभागीय जांचों में महेंद्र सिंह को आरोपों से मुक्त कर दिया गया था। इन जांचों में उनका जाति प्रमाण-पत्र वैध पाया गया था।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि हाई पावर कमेटी ने अब तक इस मामले में कोई जांच नहीं की थी। इसके अतिरिक्त, सभी संबंधित पक्ष अब सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
इन परिस्थितियों को देखते हुए, कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि जांच का आदेश कानूनन टिकाऊ नहीं है। परिणामस्वरूप, हाई कोर्ट ने 2005 के आदेश और उससे संबंधित 2008 के आदेश, दोनों को निरस्त कर दिया।

