बुलंद सोच।
मध्य प्रदेश के दूरदराज और आदिवासी अंचलों के सरकारी अस्पतालों में अब विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी नहीं खलेगी। सरकार ने गांवों में डॉक्टरों की कमी खत्म करने के लिए ‘यू कोट, वी पे’ (आप मांगिए, हम देंगे) नामक एक अनोखी नीति तैयार की है। इस नई व्यवस्था के तहत, सरकार विशेषज्ञ डॉक्टरों से सीधा संवाद करके यह पूछेगी कि वे ग्रामीण इलाकों में सेवाएं देने के लिए कितना वेतन चाहते हैं। उनकी मांग के आधार पर ही उनका मानदेय तय किया जाएगा।
ग्रामीण सेवा देने वाले डॉक्टरों को प्रोत्साहन
सरकार ने डॉक्टरों को एक और बड़ा ऑफर दिया है, जिसके तहत दुर्गम और ग्रामीण इलाकों में सेवाएं देने वाले युवा डॉक्टरों को आगे की पढ़ाई (पीजी एडमिशन) के दौरान सीधी प्राथमिकता और बोनस अंकों का लाभ मिलेगा। इस कदम का सीधा मकसद यह है कि मनचाही कमाई और करियर में बढ़त के लालच में बड़े डॉक्टर गांवों में आएं। इससे गांव के गरीब मरीजों को इंदौर-भोपाल भागे बिना अपने जिले में ही सुपर-स्पेशलिटी इलाज मिल सकेगा। गांवों और आदिवासी इलाकों में बड़े डॉक्टर अक्सर जाने से मना कर देते हैं, क्योंकि सरकारी नौकरी का तय वेतन उन्हें कम लगता है, जबकि बड़े शहरों में वे निजी प्रैक्टिस करके उससे कहीं ज्यादा कमा सकते हैं। इसी रुकावट को दूर करने के लिए ‘यू कोट, वी पे’ नीति लाई गई है, जिसके तहत राज्य सरकारें विशेषज्ञ डॉक्टरों से आपसी बातचीत करके उनकी मांग के मुताबिक सैलरी तय कर सकती हैं। कठिन और दूरदराज के अंचलों में ड्यूटी करने वाले डॉक्टरों को सरकार विशेष ‘दुर्गम क्षेत्र भत्ता’ और रहने के लिए बेहतर क्वार्टर भी दे रही है। इसके अतिरिक्त, ग्रामीण इलाकों में सेवाएं देने वाले डॉक्टरों को आगे की उच्च शिक्षा (पीजी कोर्स) में एडमिशन के दौरान सीधी प्राथमिकता और आरक्षण का लाभ भी दिया जा रहा है।
विशेषज्ञों की कमी दूर करने के अन्य उपाय
गांवों में डिलीवरी के समय होने वाले खतरों को टालने के लिए महिला रोग विशेषज्ञों, बाल रोग विशेषज्ञों और एनेस्थीसिया के डॉक्टरों को सिजेरियन ऑपरेशन करने पर अलग से मानदेय और इंसेंटिव दिया जा रहा है। इससे गंभीर स्थिति में भी प्रसूता को तुरंत इलाज मिल पाता है। गांव-गांव जाकर गर्भवती महिलाओं की समय पर जांच करने, टीकाकरण कराने और उनका रिकॉर्ड ऑनलाइन दर्ज करने वाली एएनएम (ANM) बहनों को भी विशेष प्रोत्साहन राशि दी जा रही है। साथ ही, किशोर-किशोरियों के स्वास्थ्य की देखभाल करने वाले स्टाफ को भी बोनस दिया जा रहा है। विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी को देखते हुए, सरकार ने सामान्य डॉक्टरों को एक साथ कई काम सीखने (मल्टी-स्किलिंग) की ट्रेनिंग देना शुरू किया है। इससे एक ही डॉक्टर प्रसूति, बच्चों के इलाज और बेसिक एनेस्थीसिया देने जैसे काम आसानी से संभाल लेते हैं और मरीजों का इलाज रुकता नहीं है।
स्वास्थ्य सुविधाओं में केंद्र और राज्य की भूमिका
संसद में सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि स्वास्थ्य सुविधाएं देना मुख्य रूप से राज्य सरकार का काम है। हालांकि, केंद्र सरकार ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन’ (एनएचएम) के तहत हर कदम पर आर्थिक मदद, बजट और योजनाएं मुहैया करा रही है, ताकि प्रदेश का कोई भी नागरिक बिना इलाज के न रहे।
लोकसभा में उठे सवाल पर केंद्र का जवाब
लोकसभा में रतलाम-झाबुआ-अलीराजपुर संसदीय क्षेत्र की सांसद अनिता नागरसिंह चौहान ने आदिवासी इलाकों में डॉक्टरों और अस्पतालों की कमी का मुद्दा उठाया था। इसके लिखित जवाब में, केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने बताया कि केंद्र सरकार ने मध्य प्रदेश के लिए कुल 14 नए सरकारी मेडिकल कॉलेजों की मंजूरी दी है। इनमें से 6 मेडिकल कॉलेज सीधे आदिवासी बहुल जिलों में बनाए जा रहे हैं। केंद्र सरकार की विशेष योजना के तहत नया मेडिकल कॉलेज उन जिलों में खोला जाता है जहां पहले से कोई भी सरकारी या प्राइवेट मेडिकल कॉलेज उपलब्ध नहीं होता। सरकार ऐसे पिछड़े और ‘आकांक्षी जिलों’ को पहली प्राथमिकता देती है ताकि उन इलाकों में स्वास्थ्य का ढांचा सुधर सके जहां आजादी के बाद से सुविधाएं कम थीं।
नए मेडिकल कॉलेजों से स्थानीय मरीजों को लाभ
संसदीय क्षेत्र संख्या 24 (रतलाम-झाबुआ-अलीराजपुर) के अंचल और दूरदराज गांवों में रहने वाले गरीब व आदिवासी परिवारों को अब गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए इंदौर, अहमदाबाद या बड़े शहरों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। जिला अस्पतालों को मेडिकल कॉलेज में अपग्रेड करने से स्थानीय स्तर पर ही विशेषज्ञ डॉक्टर, आधुनिक मशीनें और गंभीर बीमारियों का मुफ्त व बेहतर इलाज मिल सकेगा। इन मेडिकल कॉलेजों के निर्माण पर होने वाले खर्च में केंद्र और राज्य सरकार मिलकर हिस्सेदारी कर रहे हैं। मध्य प्रदेश जैसे सामान्य राज्यों में 60 प्रतिशत पैसा केंद्र सरकार दे रही है और 40 प्रतिशत खर्च राज्य सरकार उठा रही है।
