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2026-08-04

मध्य प्रदेश ने देश में सर्वाधिक 371.54 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र खोया

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, भोपाल।

संसद में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ है कि मध्य प्रदेश देश में सबसे अधिक वन आवरण खोने वाला राज्य बन गया है। भारतीय वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR) 2021 से 2023 के बीच राज्य ने 371.54 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र गंवा दिया। यह देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सबसे अधिक गिरावट है। भारतीय वन स्थिति रिपोर्ट-2021 के अनुसार, मध्य प्रदेश का कुल वन आवरण 77,444.98 वर्ग किलोमीटर था, जो ISFR-2023 में घटकर 77,073.44 वर्ग किलोमीटर रह गया।

विकास परियोजनाओं के लिए भूमि डायवर्जन

पिछले पांच वर्षों में विकास परियोजनाओं के लिए 24,969.87 हेक्टेयर वन भूमि का भूमि उपयोग बदला गया। इस मामले में भी मध्य प्रदेश देश में पहले स्थान पर है। 1 अप्रैल 2021 से 31 मार्च 2026 के बीच देशभर में 1,05,594.32 हेक्टेयर वन भूमि गैर-वानिकी कार्यों के लिए डायवर्ट की गई। इसमें अकेले मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी 24,969.87 हेक्टेयर रही, जो करीब 23.65 प्रतिशत है। इसका अर्थ है कि देश में गैर-वानिकी कार्यों के लिए दी गई हर चौथी हेक्टेयर वन भूमि मध्य प्रदेश से गई। पिछले पांच वर्षों में देशभर में 23,976.72 हेक्टेयर वन भूमि खनन एवं उत्खनन के लिए स्वीकृत की गई। सड़क निर्माण के लिए 22,284.65 हेक्टेयर, जलविद्युत एवं सिंचाई परियोजनाओं के लिए 18,788.12 हेक्टेयर और पावर ट्रांसमिशन लाइनों के लिए 14,006.45 हेक्टेयर वन भूमि हस्तांतरित की गई। इन श्रेणियों में मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी सबसे अधिक रही।

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राष्ट्रीय वन आवरण की स्थिति और लक्ष्य

देश का कुल वन आवरण 7,15,342.61 वर्ग किलोमीटर है, जो कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 21.76 प्रतिशत है। देशभर में कुल 156.41 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र बढ़ा, जबकि मध्य प्रदेश में सबसे अधिक कमी दर्ज की गई। बिहार (129.19 वर्ग किमी), गुजरात (180.07 वर्ग किमी), कर्नाटक (147.70 वर्ग किमी), केरल (133.42 वर्ग किमी), मिजोरम (241.73 वर्ग किमी), ओडिशा (151.89 वर्ग किमी) और उत्तर प्रदेश (118.43 वर्ग किमी) ने वन क्षेत्र बढ़ाया है। केंद्र सरकार ने बताया कि वर्ष 2011 से 2020 के बीच देश में 21.76 मिलियन हेक्टेयर अवक्रमित (डीग्रेडेड) भूमि का पुनरुद्धार किया गया। वर्ष 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर बंजर एवं अवक्रमित भूमि को फिर से हरित बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम और हरित भारत मिशन संचालित किए जा रहे हैं।

संरक्षण के उपाय और वन्यजीवों पर खतरा

पर्यावरण मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारतीय वन अधिनियम, 1927 और वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 के तहत वनों के संरक्षण की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। विकास परियोजनाओं के लिए वन भूमि देने पर प्रतिपूरक वनीकरण अनिवार्य है। साथ ही नेट प्रेजेंट वैल्यू (NPV) की राशि CAMPA के माध्यम से नए जंगल विकसित करने में खर्च की जाती है। मध्य प्रदेश ‘टाइगर स्टेट’ के रूप में जाना जाता है। लगातार वन कटाई और आधारभूत ढांचा परियोजनाओं के कारण बांधवगढ़, कान्हा, पन्ना और सतपुड़ा के बाघों एवं अन्य वन्यजीवों के प्राकृतिक कॉरिडोर प्रभावित हो रहे हैं। जंगलों के विखंडन से मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।

वन प्रबंधन नीतियों की समीक्षा की आवश्यकता

संसदीय रिपोर्ट के आंकड़े संकेत देते हैं कि राज्य को अपनी वन प्रबंधन नीतियों की समीक्षा करनी चाहिए। प्रतिपूरक वनीकरण के तहत लगाए गए पौधों की जीवित रहने की दर का पारदर्शी डिजिटल ऑडिट आवश्यक है। परिवेश (PARIVESH) पोर्टल पर स्वीकृत परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभावों की नियमित स्वतंत्र समीक्षा भी आवश्यक है।

नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार का बयान

नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि जंगलों की जमीन पर अवैध कब्जे हो रहे हैं, इसके दो कारण हैं। उन्होंने बताया कि सरकार 2005 के हिसाब से यह तय नहीं कर पाई कि कौन से लोग काबिज हैं और किसको पट्टे देना है। सिंघार ने आरोप लगाया कि मध्य प्रदेश के नए मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल के समय में नर्मदा किनारे पौधे लगाने में बड़ा घोटाला हुआ था। उन्होंने मुख्य सचिव महोदय से पूछा कि जंगल कब बचेंगे, जब बड़ी-बड़ी कंपनियों को जमीनें दी जा रही हैं। सिंघार ने यह भी पूछा कि क्या अंडरग्राउंड माइनिंग नहीं हो सकती, जिससे जंगल सुरक्षित रहें। उन्होंने कहा कि सरकार जंगल कटवा कर माइनिंग की अनुमति दे रही है और इन्हीं के लोगों को लाभ हो रहा है। नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि सरकार को नीति बदलने की आवश्यकता है।