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2026-07-24

27% ओबीसी आरक्षण पर मप्र हाई कोर्ट में नया मोड़, एसटी वर्ग ने भी विरोध दर्ज कराया

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, जबलपुर।

मध्य प्रदेश में 27 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण के मामले में बुधवार को हाई कोर्ट के प्रशासनिक न्यायाधीश आनंद पाठक व न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान एक नया मोड़ आया। सामान्य वर्ग के बाद अब अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग ने भी बढ़े हुए ओबीसी आरक्षण का विरोध किया।
एसटी पक्ष का तर्क था कि ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने से सामान्य मेरिट की सीटें कम होंगी, जिससे मेरिट के आधार पर चयनित होने वाले एसटी अभ्यर्थियों के अवसर भी प्रभावित होंगे।
एसटी याचिकाकर्ता रितु बडोले की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा मुक्ता ने पक्ष रखते हुए कहा कि एसटी वर्ग को आरक्षित कोटे के अलावा सामान्य वर्ग की सीटों पर भी मेरिट के आधार पर चयन मिलता है। उन्होंने बताया कि यदि ओबीसी आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया जाता है तो यह अतिरिक्त 13 प्रतिशत सामान्य वर्ग की सीटों से ही जाएगा, जिससे अन्य वर्गों के मेधावी अभ्यर्थियों के अवसर भी घटेंगे।
इस दौरान न्यायमूर्ति विनय सराफ ने मौखिक रूप से सवाल किया कि जब एसटी वर्ग के लिए आरक्षित 30 से 40 प्रतिशत सीटें कई बार रिक्त रह जाती हैं, तब ओबीसी आरक्षण को एसटी के साथ भेदभाव कैसे माना जा सकता है।
इस पर एसटी पक्ष ने कहा कि यह विवाद आरक्षित सीटों का नहीं, बल्कि सामान्य मेरिट की सीटों में होने वाली कटौती का है।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर के अनुसार 10 प्रतिशत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) आरक्षण पर भी चर्चा हुई। अदालत में यह पक्ष रखा गया कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण क्षैतिज (हॉरिजॉन्टल) प्रकृति का है। इसलिए इसे 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा के संदर्भ में अलग तरीके से देखा जाना चाहिए।
ओबीसी की ओर से अधिवक्ता वरुण ठाकुर ने अदालत को बताया कि प्रदेश में वर्तमान में कुल 60 प्रतिशत आरक्षण लागू है। अदालत ने उन्हें अगली सुनवाई में इस संबंध में विस्तृत तथ्य प्रस्तुत करने के निर्देश दिए।
इस मामले में सामान्य वर्ग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य सांघी व अधिवक्ता अपराजिता ने भी अपना पक्ष रखा।
इस महत्वपूर्ण मामले की अगली सुनवाई 23 जुलाई को दोपहर 12 बजे होगी।

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