बुलंद सोच, ग्वालियर।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने पटवारी भर्ती से जुड़े एक मामले में राज्य सरकार की अपील स्वीकार कर ली है। खंडपीठ ने सिंगल बेंच के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें एक अभ्यर्थी को पटवारी पद पर नियुक्ति देने के निर्देश दिए गए थे।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल विश्वविद्यालय द्वारा डिप्लोमा या मार्कशीट जारी कर देने से भर्ती के लिए आवश्यक पात्रता सिद्ध नहीं होती। यह भी साबित करना होगा कि संबंधित संस्थान, पाठ्यक्रम और डिस्टेंस एजुकेशन के माध्यम से संचालित कोर्स को नियमानुसार मान्यता प्राप्त थी।
इस मामले में राज्य सरकार ने 10 दिसंबर 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें शेर सिंह रावत को पटवारी पद पर नियुक्ति देने के निर्देश दिए गए थे।
सरकार का तर्क था कि भर्ती के लिए यूजीसी से मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से संबद्ध संस्थान का कंप्यूटर एप्लीकेशन डिप्लोमा अनिवार्य था। जबकि, शेर सिंह रावत का डिप्लोमा शिवपुरी के एक डिस्टेंस एजुकेशन सेंटर से प्राप्त था, जिसे उस माध्यम से कोर्स संचालित करने की स्वीकृति नहीं थी।
वहीं, शेर सिंह रावत ने अपना तर्क प्रस्तुत करते हुए कहा कि उन्होंने चयन परीक्षा पास कर ओबीसी वर्ग में 145वीं रैंक हासिल की थी। उन्होंने यह भी बताया कि गुरु घासीदास विश्वविद्यालय द्वारा जारी उनका डिप्लोमा कभी निरस्त नहीं किया गया था।
डिवीजन बेंच ने कहा कि भर्ती प्राधिकारी का दायित्व केवल अंकपत्र देखना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि संबंधित पाठ्यक्रम मान्यता प्राप्त हो।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मेरिट या वेटिंग सूची में स्थान मिलने मात्र से नियुक्ति का अधिकार नहीं बनता है। साथ ही, अन्य अभ्यर्थियों की नियुक्ति के आधार पर समानता का दावा भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। इन्हीं टिप्पणियों के साथ, उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की अपील मंजूर करते हुए सिंगल बेंच का आदेश निरस्त कर दिया, 4 अगस्त 2016 का मूल आदेश बहाल किया और शेर सिंह रावत की रिट याचिका खारिज कर दी।

