बुलंद सोच, जयपुर।

बॉलीवुड अभिनेत्री नीना गुप्ता ने समाज में महिलाओं की स्थिति पर अपनी राय व्यक्त की। उन्होंने कहा कि महिलाओं की स्थिति को लेकर जितनी बातें की जाती हैं, असलियत उससे कहीं अलग है।
गुप्ता ने बताया कि आज भी देश के अधिकांश घरों में लड़कियों के लिए सोच नहीं बदली है। उन्होंने कहा कि ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ का नारा देने से पहले दादा-दादी और नाना-नानी को शिक्षित करना होगा, तभी बेटियां सच में बचेंगी।
यह बात नीना गुप्ता ने जयपुर के होटल ललित में आयोजित ‘डायलॉग ऑन मेंटल वेलनेस’ कार्यक्रम में कही। इस दौरान उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘सच कहूं तो’, परिवार, महिलाओं की स्थिति, पालन-पोषण, रिश्तों, मानसिक स्वास्थ्य और अपने जीवन के अनुभवों पर खुलकर चर्चा की।
महिलाओं की स्थिति पर उन्होंने कहा कि शहरों में थोड़ा बदलाव जरूर दिखता है, लेकिन गांवों और छोटे कस्बों में हालात अब भी पहले जैसे हैं। उन्होंने बताया कि हम लोग शायद एक-दो प्रतिशत आबादी की बात कर रहे हैं, जबकि बाकी जगह आज भी घूंघट, पैर छूना और सेवा करना है, बहुत कुछ नहीं बदला है।
आत्मकथा लेखन का अनुभव
नीना गुप्ता ने बताया कि अपनी आत्मकथा लिखने का विचार उन्हें करीब 25 साल पहले आया था। उन्होंने कहा कि शुरू में जब उनके पास काम नहीं था, तब उनकी कोई वैल्यू नहीं थी, और कोई भी उनके बारे में कुछ भी लिख देता था।
तब उन्हें लगा कि किसी को पता ही नहीं कि वह असल में कैसी हैं, इसलिए उन्होंने सोचा कि वह खुद लिखेंगी कि वह वास्तव में कैसी हैं। उन्होंने बताया कि शुरुआत में उन्होंने किताब लिखने के लिए एडवांस भी ले लिया था, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाईं।
वह अपनी मम्मी, पापा, भाई और उनके परिवार के बारे में लिखना चाहती थीं, जिन्होंने पूरी जिंदगी अपनी सच्चाई छिपाकर रखी थी। उन्हें लगा कि उन्हें उनकी जिंदगी सामने लाने का अधिकार नहीं है।
जब भी वह लिखना शुरू करतीं, तो सोचतीं कि मम्मी, पापा या भाई को बुरा लगेगा, और वह रुक जाती थीं।
कोविड काल में पूरी हुई किताब
गुप्ता ने कहा कि कोविड के दौरान जब वह छह महीने अपने पहाड़ी घर में रहीं, तब जाकर किताब पूरी हो सकी। तब तक उनके परिवार के लगभग सभी लोग इस दुनिया से जा चुके थे।
उन्होंने बताया कि तब उन्हें किसी का डर नहीं था, क्योंकि हम सबसे ज्यादा अपने लोगों से ही डरते हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि वह तो भगवान से ज्यादा अपनी बेटी से डरती हैं।
नीना ने स्वीकार किया कि उन्होंने अपनी किताब में भी सब कुछ नहीं लिखा। उन्होंने कहा कि उन्होंने झूठ नहीं लिखा, लेकिन सब कुछ भी नहीं लिखा।
उन्होंने कुछ लोगों के बारे में बातें छिपा दीं, क्योंकि उन्हें लगा कि वह उनकी बेटी मसाबा, उनके पति या कुछ दूसरे लोगों के लिए ठीक नहीं होगा। वह किसी से बदला नहीं लेना चाहती थीं।
गुप्ता ने कहा कि उनके पास मौका था कि जिन लोगों ने उनके साथ गलत किया, उनके बारे में लिखतीं, लेकिन उन्होंने खुद को रोका। उन्होंने हंसते हुए कहा कि प्रकाशक के वकीलों ने तो उन्हें लगभग सभी लोगों के नाम तक बदलने के लिए कह दिया था।
मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत सोच
मानसिक स्वास्थ्य पर बात करते हुए नीना ने कहा कि वह अपना मन भगवान के सामने खोल देती हैं। वह दिन में कम से कम दस बार भगवान को धन्यवाद कहती हैं।
उन्होंने बताया कि जब रात को अपनी सफेद चादर पर लेटती हैं तो सबसे पहले ‘थैंक यू’ बोलती हैं। और जब गुस्सा आता है तो भगवान को डांटती भी हैं।
गुप्ता ने कहा कि कोई तो ताकत है जो उनसे बड़ी है, वह उसी से बात करती हैं।
'पंचायत' वेबसीरीज का अनुभव
नीना ने ‘पंचायत’ की शूटिंग के दौरान मध्य प्रदेश के एक गांव का अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि उन्होंने एक लड़की से पूछा कि वह क्या पढ़ती है।
उसकी मां ने जवाब दिया कि वह पढ़ तो रही है, लेकिन 18 साल की होते ही शादी कर देंगे। फिर घूंघट करेगी, घर संभालेगी, बच्चे पैदा करेगी। गुप्ता ने कहा कि यह आज भी हो रहा है।
उन्होंने कहा कि केवल बेटी को पढ़ाने से बदलाव नहीं आएगा। उन्होंने अपनी एक दोस्त से कहा कि ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ से पहले दादा-दादी और नाना-नानी को पढ़ाओ।
गुप्ता के अनुसार, जब तक उनकी सोच नहीं बदलेगी, बेटी पढ़ भी जाएगी तो उससे कहा जाएगा कि अब बर्तन मांजो।
बच्चों के पालन-पोषण पर विचार
अपनी बेटी मसाबा के साथ रिश्ते का जिक्र करते हुए नीना गुप्ता ने कहा कि समय के साथ उन्होंने खुद भी बहुत कुछ सीखा। पहले वह कहती थीं- नहीं जाना है तो नहीं जाना है।
फिर जवाब मिलता था- मैं तो जाऊंगी। बाद में उन्हें समझ आया कि अगर वही बात प्यार से कहें कि बेटा, मुझे यह ठीक नहीं लग रहा, बाकी फैसला तुम्हारा है, तो वह खुद सोचती थी।
उन्होंने कहा कि बच्चे वही सीखते हैं जो माता-पिता करते हैं। एक दिन उन्होंने बेटी से कहा कि चिल्लाओ मत। बेटी ने जवाब दिया- आप भी तो चिल्लाती हैं।
तब उन्हें समझ आया कि बच्चे वही दोहराते हैं जो हमें करते हुए देखते हैं।
करियर और रिश्तों पर आत्ममंथन
कार्यक्रम में नीना गुप्ता ने अपने करियर को लेकर खुलकर आत्ममंथन किया। उन्होंने कहा कि अगर उनका फोकस सही रहता तो वह और ऊंचाई तक पहुंच सकती थीं।
एक समय ऐसा आया जब उनका ध्यान काम से ज्यादा एक अच्छे जीवनसाथी की तलाश पर चला गया। उन्हें लगता है कि यही उनकी सबसे बड़ी गलती थी।
गुप्ता ने कहा कि महिलाओं का फोकस कई बार करियर से हटकर पति ढूंढने पर चला जाता है। उन्होंने अर्जुन की तरह अगर सिर्फ लक्ष्य पर नजर रहे तो मंजिल जरूर मिलती है।
आज की पीढ़ी में भ्रम
युवाओं की मानसिक स्थिति पर उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी सबसे ज्यादा भ्रम में है। उन्होंने बताया कि वह कई युवा लड़कियों के साथ काम कर रही हैं।
वे कहती हैं कि अच्छे लड़के नहीं मिलते। वे डेटिंग ऐप्स पर जा रही हैं, लेकिन वहां भी परेशान हैं। दूसरी तरफ लड़के भी यही कहते होंगे कि अच्छी लड़कियां नहीं मिलतीं।
गुप्ता के अनुसार, यह पीढ़ी बहुत कन्फ्यूज है। घर में पुराने विचार हैं और बाहर बहुत आधुनिक सोच है। ऐसे में उन्हें समझ नहीं आता कि सही क्या है।
कार्यक्रम के अंत में उन्होंने कहा कि जिंदगी में ठोकरें जरूरी हैं। जीवन जीना कोई सिखा नहीं सकता। हर किसी की परेशानियां अलग होती हैं।
उन्होंने कहा कि अनुभव से सीखना पड़ता है। अगर ऊपर पहुंचना है तो गिरना भी पड़ेगा। बिना गिरे कोई आगे नहीं बढ़ता।

