बुलंद सोच, भोपाल।
नर्मदा नदी में एक धार्मिक आयोजन के दौरान लगभग 11 हजार लीटर दूध और 210 साड़ियों के अर्पण से जुड़े मामले में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की केंद्रीय पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।
अधिकरण ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में ऐसा कोई वैधानिक प्रावधान उपलब्ध नहीं है, जो धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान नदी में दूध अर्पित करने पर प्रतिबंध लगाता हो।
हालांकि, एनजीटी ने यह भी कहा कि बड़ी मात्रा में दूध को सीधे नदी में प्रवाहित करना पर्यावरणीय दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता है। इसलिए, भविष्य में ऐसे आयोजनों के दौरान विशेष निगरानी और आवश्यक एहतियात बरतना अनिवार्य होगा।
जल गुणवत्ता पर वैज्ञानिक रिपोर्ट
सुनवाई के दौरान मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी) ने संयुक्त समिति की रिपोर्ट प्रस्तुत की। रिपोर्ट के अनुसार, नर्मदा नदी के सतत प्रवाह, पर्याप्त जलराशि, प्राकृतिक आत्मशुद्धिकरण क्षमता और ऑक्सीजन के पुनर्भरण (री-एरेशन) के कारण उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्यों में इस घटना से नदी की जल गुणवत्ता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पाया गया।
समिति ने यह भी माना कि दूध जैविक और शीघ्र विघटित होने वाला पदार्थ है, फिर भी इसे बड़ी मात्रा में किसी भी जलस्रोत में प्रवाहित करना पर्यावरणीय दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।
धार्मिक परंपरा पर रोक का आधार नहीं
याचिकाकर्ता सिद्धार्थ सिंह राजपूत की याचिका पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने कहा कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई कानूनी प्रावधान प्रस्तुत नहीं कर सके, जिससे यह सिद्ध हो कि धार्मिक अनुष्ठानों में दूध अर्पित करना प्रतिबंधित है।
अधिकरण ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्तमान एसओपी केवल नदी तट पर धार्मिक आयोजनों के लिए प्रशासनिक अनुमति और पर्यावरणीय प्रबंधन की प्रक्रिया निर्धारित करती है, न कि दूध अर्पित करने पर रोक लगाती है। ऐसे में, केवल इसी आधार पर धार्मिक परंपरा पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है।
पीसीबी और प्रशासन को निगरानी के निर्देश
एनजीटी ने याचिका का निस्तारण करते हुए मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश दिए कि भविष्य में नर्मदा तट पर होने वाले बड़े धार्मिक आयोजनों पर विशेष निगरानी रखी जाए।
बोर्ड स्थानीय प्रशासन के साथ समन्वय स्थापित कर यह सुनिश्चित करे कि नदी में अत्यधिक मात्रा में दूध प्रवाहित न हो और पर्यावरणीय मानकों का पालन किया जाए।
समिति के भविष्य के लिए सुझाव
संयुक्त समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि नर्मदा जैसी सतत प्रवाह वाली नदी में दूध का प्रभाव सीमित हो सकता है, लेकिन तालाब, झील, जलाशय और कम प्रवाह वाले जलस्रोतों में इसका असर अधिक गंभीर हो सकता है।
समिति ने सुझाव दिया कि भविष्य में ऐसे धार्मिक आयोजन केवल प्रशासन की पूर्व अनुमति से निर्धारित घाटों पर हों तथा कचरा प्रबंधन, स्वच्छता, भीड़ नियंत्रण और पर्यावरण संरक्षण की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
