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2026-08-14

प्रो. करंदीकर: एक लाख करोड़ के शोध कोष से 10 साल में उभरेंगी कम से कम 10 बड़ी टेक कंपनियां

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच।

भारत अब तकनीक का सिर्फ उपभोक्ता बने रहने के बजाय अपनी तकनीक गढ़ने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। देश ने 5जी के स्वदेशी टेक्नोलॉजी स्टैक से भारतीय भाषाओं पर आधारित एआई मॉडल और क्वांटम संचार तक तेजी से प्रगति की है। अब सरकार का जोर शोध और नवाचार में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर है।
अमर उजाला के विशेष पॉडकास्ट ‘अनम्यूट भारत’ में नीति आयोग के पूर्णकालिक सदस्य और पूर्व विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सचिव प्रो. अभय करंदीकर ने विकसित भारत 2047 के लिए विज्ञान और तकनीक की भूमिका पर रोडमैप प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि एक लाख करोड़ रुपये का शोध, विकास और नवाचार कोष यदि सही तरीके से इस्तेमाल हुआ, तो अगले 10 वर्षों में भारत से तकनीक के क्षेत्र में कम से कम 10 बड़ी कंपनियां उभर सकती हैं। इससे भारत से एलन मस्क या स्टीव जॉब्स जैसी तकनीकी प्रतिभा के उभरने की जमीन भी तैयार होगी।

सूचना क्रांति के साथ सूचना युद्ध का खतरा

प्रो. करंदीकर के अनुसार, मोबाइल, इंटरनेट और एआई ने सूचना का लोकतंत्रीकरण किया है। आज मोबाइल से कोई भी व्यक्ति सूचना हासिल करने के साथ उसका निर्माता भी बन सकता है।
सूचना की इस बाढ़ में उसकी विश्वसनीयता सबसे बड़ी चुनौती है। एआई के जरिये प्रामाणिक सूचना को भी तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है और नरेटिव बदला जा सकता है। ऐसे में एथिकल एआई, एआई गवर्नेंस और डेटा गवर्नेंस आवश्यक हैं।

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स्वदेशी क्षमता का विस्तार

भारत 4जी और 5जी की स्वदेशी तकनीक विकसित कर चुका है। एआई में आईआईटी बॉम्बे की अगुवाई वाले कंसोर्टियम ने भारतजेन विकसित किया है।
स्टार्टअप सर्वम का मॉडल भारतीय भाषाओं और भारतीय डेटा पर आधारित है। क्वांटम संचार में क्यूएनयू लैब्स जैसे स्टार्टअप भी वैश्विक स्तर की तकनीक विकसित कर रहे हैं।

शोध-नवाचार में निजी निवेश की चुनौती

प्रो. करंदीकर के मुताबिक, भारत का आरएंडडी खर्च सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.84% पहुंच गया है और अगले दो वर्षों में इसके 1% होने का अनुमान है। अमेरिका, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देश अपने जीडीपी का 2-3 प्रतिशत शोध पर खर्च करते हैं।
एक बड़ी समस्या यह है कि विकसित देशों में आरएंडडी का 70-80 प्रतिशत खर्च निजी क्षेत्र उठाता है, जबकि भारत में सरकार 50-60 प्रतिशत और निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी 30-40 प्रतिशत है।
निजी कंपनियां अत्याधुनिक शोध से इसलिए कतराती हैं क्योंकि इसमें छह-सात साल लग सकते हैं और बाजार में सफलता की कोई गारंटी नहीं होती। इसी जोखिम को कम करने के लिए सरकार ने एक लाख करोड़ रुपये के शोध, विकास और नवाचार कोष की घोषणा की है।

कोष की सफलता का पैमाना

प्रो. करंदीकर के अनुसार, इस कोष की सफलता का पैमाना सिर्फ पैसा खर्च होना नहीं, बल्कि अगले 10 वर्षों में तकनीक के क्षेत्र में 10 बड़ी कंपनियों का उभरना होगा।
ये कंपनियां एआई, ड्रोन, क्वांटम, दूरसंचार, ड्रग डिस्कवरी और सेल-जीन थेरेपी जैसे क्षेत्रों में हो सकती हैं।
उन्होंने कहा कि भारत के पास बड़ी युवा प्रतिभा और मजबूत तकनीकी संस्थान हैं। इसलिए बड़ी तकनीकी कंपनियां खड़ी करने के लिए परिस्थितियां अब पहले से कहीं अधिक अनुकूल हैं।