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2026-08-14

एआई का सही उपयोग सिखाना होगा, अत्यधिक निर्भरता खतरनाक: विशेषज्ञ

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, इंदौर।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आज बच्चों और युवाओं की पढ़ाई का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसे रोकना न तो संभव है और न ही उचित है। आवश्यकता इस बात की है कि बच्चों को एआई का सही और जिम्मेदारी से उपयोग करना सिखाया जाए। एआई जानकारी प्रदान कर सकता है, कठिन विषयों को सरल भाषा में समझा सकता है, नए विचार दे सकता है और सीखने में सहायता कर सकता है। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि बच्चे हर कार्य का तैयार जवाब लेकर उसे कॉपी-पेस्ट करने लगें। एआई पर अत्यधिक निर्भरता बच्चों की सोचने, सवाल करने, शोध करने और समस्याओं का समाधान स्वयं खोजने की क्षमता को कमजोर कर सकती है। विशेषज्ञों ने नईदुनिया संवाद कार्यक्रम में ‘एआई के दौर में बच्चों का भविष्य: बदलती शिक्षा, नए कौशल और करियर की चुनौतियां’ विषय पर ये बातें कहीं। विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि कई बार एआई गलत जानकारी भी देता है, इसलिए प्राप्त जानकारी की जांच करना आवश्यक है। बच्चों को यह समझना होगा कि एआई एक सहायक है, उनकी जगह सोचने वाला नहीं। स्कूलों और परिवारों की यह जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को एआई के लाभ और सीमाएं दोनों समझाएं। उन्हें एआई के साथ अपनी रचनात्मकता, व्यावहारिक ज्ञान और मानवीय संवेदनाओं को भी विकसित करना होगा।

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रचनात्मकता और आलोचनात्मक सोच पर प्रभाव

पूर्व विज्ञानी, आरआर कैट के संजय खेर ने बताया कि एआई ग्रामीण क्षेत्रों में काफी मदद कर रहा है और एआई टूल्स 24 घंटे उपलब्ध रहते हैं। यह विद्यार्थियों के लिए कठिन चीजों को आसान बना सकता है और उन्हें उनकी भाषा में बदल सकता है। आज दृष्टिबाधित व्यक्ति भी एआई का उपयोग कर रहे हैं। हालांकि, उन्होंने चिंता व्यक्त की कि एआई के कारण रचनात्मक कौशल और सोच समाप्त हो रही है, क्योंकि एआई के माध्यम से तैयार जानकारी काफी मात्रा में उपलब्ध है। एसजीएसआईटीएस इनक्यूबेशन फोरम के अतुल जैन ने कहा कि विद्यार्थियों द्वारा मोबाइल में देखे जाने वाले एआई से जुड़े वीडियो पर आसानी से भरोसा नहीं किया जा सकता, जो उनके लिए खतरा है। उन्होंने सुझाव दिया कि एआई को सीमित दायरे में ही रखना होगा, क्योंकि बच्चों को पूर्ण रूप से एआई का उपयोग करने देना खतरनाक हो सकता है। अतुल जैन ने यह भी बताया कि कई बार एआई सवालों के गलत उत्तर भी देता है, जिन पर बच्चे भरोसा कर लेते हैं, और यह प्रवृत्ति बच्चों पर गलत असर डाल रही है। सीबीएसई के सिटी कोऑर्डिनेटर यूके झा ने कहा कि शिक्षकों के लिए एआई एक बेहतरीन और सहायक उपकरण साबित हो सकता है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि एआई पर अत्यधिक निर्भरता के कारण बच्चों के साथ-साथ हर किसी की सोचने, स्वयं से सवाल करने की आदत धीरे-धीरे कम हो रही है। उनकी राय में, हर समस्याओं का जवाब तुरंत एआई से पाने की आदत की वजह से स्वयं परेशानी को हल करने की जिज्ञासा भी खत्म होती जा रही है। इंदौर मैनेजमेंट एसोसिएशन के ईसी मेंबर श्रेयस डिंगे ने बताया कि एआई के बढ़ते उपयोग के कारण शिक्षा और रोजगार दोनों में बड़ा बदलाव आ रहा है। उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि विद्यार्थियों की सोचने, तर्क करने और समस्या हल करने की क्षमता कम हो रही है। श्रेयस डिंगे ने कहा कि एआई से डरने के बजाय उसे जिम्मेदारी और सही तरीके से इस्तेमाल करना जरूरी है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि शिक्षा व्यवस्था में ऐसे बदलाव होने चाहिए जिनसे विद्यार्थी एआई को सहायक के रूप में इस्तेमाल करें, लेकिन अपनी सोच, रचनात्मकता और निर्णय लेने की क्षमता न खोएं। ट्रेनर व इंटरप्रिन्योर आस्था सोहनी ने कहा कि आज जब बच्चों को स्कूल या कॉलेज का होमवर्क करना होता है, तो वे सीधे सवाल की फोटो खींचकर एआई टूल पर अपलोड कर देते हैं और कुछ ही मिनट में उत्तर लिखवा लेते हैं। उनके अनुसार, ऐसे में बच्चों में शोध करने और समस्याओं को हल करने की क्षमता लगभग पूरी तरह से खत्म होती जा रही है। आस्था सोहनी ने सलाह दी कि एआई को केवल होमवर्क पूरा करने का जरिया न बनाकर, इसे एक पर्सनल ट्यूटर या लर्निंग असिस्टेंट की तरह इस्तेमाल किया जाना चाहिए। डॉ. चेतना दीक्षित ने कहा कि एआई का उपयोग समय की मांग बन गया है, लेकिन इसकी वजह से बच्चों का स्क्रीन टाइम बहुत ज्यादा बढ़ गया है। उन्होंने बताया कि एआई ने उनके सोचने के तरीके को खुद के काबू में कर लिया है, जिसकी वजह से उनका दिमाग उन्हें संकेत ही नहीं दे रहा है। इसके लिए उन्होंने जरूरी बताया कि माता-पिता बच्चों पर ध्यान रखें कि वे एआई का उपयोग किस तरह से कर रहे हैं, क्या जानकारी ले रहे हैं और क्या सीख रहे हैं।

उच्च शिक्षा और कौशल विकास में बदलाव

शासकीय निर्भय सिंह पटेल कॉलेज के पूर्व प्राचार्य प्रो. राजेश दीक्षित ने कहा कि वर्तमान में हम एआई का प्रभाव देख रहे हैं, लेकिन अभी एआई के कारण जो बदलाव आया है, वह सिर्फ दो प्रतिशत है। उन्होंने अनुमान व्यक्त किया कि आने वाले दिनों में जो भी परिवर्तन होगा, उसकी हम कल्पना नहीं कर सकते। प्रो. राजेश दीक्षित ने जोर देकर कहा कि एआई के कारण उच्च शिक्षा में बदलाव आना तय है, चाहे कोई भी विषय हो। ऐसे में बच्चों में समझ, नवाचार, व्यावहारिकता, दूरदृष्टि और परिवर्तन की क्षमता का होना जरूरी है। एसजीएसआईटीएस की प्रोफेसर डा. सुनीता वर्मा ने कहा कि बच्चों को पूरी तरह से एआई से दूर रखना संभव नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि एआई को एक संसाधन के रूप में उपयोग कर कौशल विकसित करना होगा। उनके अनुसार, यदि किसी के पास डिग्री है और उसने कौशल विकसित किया है, तो उसके पास बेहतर अवसर हैं। डा. सुनीता वर्मा ने यह भी कहा कि एआई शिक्षकों को भी प्रतिस्थापित नहीं कर सकता। उन्होंने बताया कि आज कैंपस चयन का तरीका भी बदल चुका है और डिग्री के साथ अब बच्चों को कौशल के आधार पर भी परखा जाता है और नौकरी दी जाती है। आईआईएम इंदौर इनक्यूबेशन सेंटर के असिस्टेंट मैनेजर शांतनु वाइकर ने कहा कि हमें एआई को एक कौशल के रूप में देखना होगा। उन्होंने बताया कि पहले शोध के दौरान कई कठिनाइयां आती थीं और कई शोध पत्र पढ़ने पड़ते थे, लेकिन एआई ने उन शोध पत्रों को एक साथ ला दिया है। शांतनु वाइकर के अनुसार, एआई की मदद से वर्गीकरण आसान हो चुका है, लेकिन चुनौतियां भी हैं। ऐसे में उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को डेटा की जांच के लिए उपकरण बनाने चाहिए, ताकि इसकी पक्षपातहीनता (बायसनलेस) को खत्म किया जा सके। स्टार्टअप फाउंडर प्रत्युष हलन ने कहा कि स्कूल में सीखी गई तार्किक तर्कशक्ति (लॉजिकल रीजनिंग) हमें आज भी मदद करती है। उन्होंने बताया कि उनके समय में रचनात्मकता के लिए हर प्रकार की स्वतंत्रता थी। प्रत्युष हलन ने जोर दिया कि एआई के दौर में हमें रचनात्मकता को स्वीकार करना होगा। उन्होंने कहा कि आज विद्यार्थियों के सामने सभी प्रकार का डेटा मौजूद है, उन्हें रटने की आवश्यकता नहीं है, सिर्फ अनुप्रयोग (एप्लीकेशन) की जरूरत है। विद्यार्थियों को यह बताना होगा कि डेटा का उपयोग कैसे किया जा सकता है और उन्हें यह सीखना होगा।

अभिभावकों और शिक्षकों की भूमिका

करियर काउंसलर विधा गांधी ने कहा कि आज अभिभावक बच्चों के लिए ऐसा करियर चाहते हैं, जिसमें लाखों रुपये का पैकेज हो। उन्होंने अभिभावकों से आग्रह किया कि वे अपने बच्चों को ज्ञान और कौशल पर काम करने को कहें, न कि पूरी तरह से एआई पर निर्भर होने पर। विधा गांधी ने बताया कि एआई वही जानकारी देता है, जो उसे फीड की जाती है। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को बेहतर तरीके से सीखकर आगे बढ़ना होगा, और बच्चों को यह बताना होगा कि एआई से सवाल कैसे किया जाता है। इंटरनेशनल एजुकेटर स्पेशलिस्ट अंकिता हेमनानी ने कहा कि बड़ों को पता है कि एआई का किस हद तक उपयोग करना है, जबकि बच्चों को यह जानकारी नहीं है। उन्होंने बताया कि एआई विद्यार्थियों के लिए काफी उपयोगी हो रहा है, अब उन्हें लाइब्रेरी नहीं जाना पड़ता। अंकिता हेमनानी के अनुसार, विश्व में करीब 86 प्रतिशत विद्यार्थी एआई का उपयोग कर रहे हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि हमें विद्यार्थियों को एआई का सही उपयोग करना सिखाना होगा और स्कूलों में इसकी पढ़ाई करवानी होगी, ताकि वे इसकी सीमा समझ सकें। अकांक्षा बांगड़ ने कहा कि हमें बच्चों को एआई का उपयोग करने देना होगा, लेकिन इसके सकारात्मक तरीके बताने होंगे। उन्होंने बताया कि ताकि जब वे बड़े होकर एआई का उपयोग करें तो इसे सकारात्मक दिशा में ले जाएं। अकांक्षा बांगड़ ने कहा कि एआई से ज्ञान मिल सकता है और इसके जरिए कौशल भी विकसित किया जा सकता है। उन्होंने जोर दिया कि एआई बच्चों के जीवन का हिस्सा बन चुका है, ऐसे में बच्चों को इसके सही और गलत उपयोग के बारे में भी जानकारी देना होगी। मेंटल हेल्थ काउंसलर तन्वी खेर ने बताया कि एआई के बारे में कई क्षेत्रों की जानकारी मिली है, जिसके बारे में हम सोच नहीं सकते थे। ऐसे में उन्होंने सुझाव दिया कि बच्चों को तकनीकी शिक्षा के साथ मनोवैज्ञानिक रूप से भी तैयार करना होगा। तन्वी खेर ने कहा कि आज विद्यार्थी एआई का इतना उपयोग कर रहे हैं कि उनका खुद पर विश्वास खत्म हो चुका है। ऐसे में विद्यार्थियों को बताना होगा कि वे एआई का किस तरह सही तरीके से और सही दिशा में उपयोग कर सकते हैं।

एआई के साथ सामंजस्य बिठाना

स्टार्टअप फाउंडर रश्मिरथी तिवारी ने कहा कि एआई एक ऐसी महाशक्ति (सुपरपावर) है जिसकी पूरी क्षमता अभी किसी को पता नहीं है। उन्होंने बताया कि नई शिक्षा नीति में व्यावहारिक और स्टेम (STEM) शिक्षा पर जोर दिया गया है। रश्मिरथी तिवारी के अनुसार, एआई का उद्देश्य बच्चों को केवल काम करवाना सिखाना नहीं, बल्कि एआई के साथ अपनी रचनात्मकता का इस्तेमाल करना सिखाना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर नई पीढ़ी को सोचने, प्रयोग करने और असफल होकर सीखने का अवसर दिया जाए, तो वे एआई का बेहतर उपयोग करके देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। स्टार्टअप फाउंडर राहुल गुप्ता ने कहा कि एआई मानव बुद्धि को पीछे नहीं छोड़ सकता। उन्होंने सुझाव दिया कि हमें एआई और मानव बुद्धि को एक साथ लाकर विद्यार्थियों के लिए उपयोग करना होगा। राहुल गुप्ता के अनुसार, एआई बच्चों के लिए जरूरी है, लेकिन हमें इस ओर भी ध्यान देने की जरूरत है कि हम उसे इसका उपयोग करना कैसे सिखाते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि बच्चों को एआई से दूर रखा गया तो बच्चे प्रतिस्पर्धा की दुनिया से बाहर हो जाएंगे। राहुल गुप्ता ने कहा कि हमें एआई के साथ जीना सीखना होगा। एआई विशेषज्ञ शब सत्यार्थी ने कहा कि एआई के कारण आ रहे बदलावों को हमें स्वीकार करना होगा। उन्होंने बताया कि एआई बच्चों के लिए चुनौती नहीं है, आज बच्चे एआई की मदद से ऐप बना रहे हैं। शब सत्यार्थी ने कहा कि हमें उनकी इस कौशल को स्वीकार करना होगा और एआई के और फायदे बताने होंगे। उन्होंने एआई को बच्चों के लिए प्रतिबंधित करना गलत बताया। शब सत्यार्थी के अनुसार, एआई डेटा दे सकता है, लेकिन समाधान नहीं बता सकता।