बुलंद सोच, भोपाल।

झीलों का शहर कहे जाने वाले भोपाल में पर्यावरण संकट में है। यहां न तो जिम्मेदार तय हैं, न सजा का प्रावधान है और न ही कोई कार्रवाई होती है। तालाबों, पहाड़ियों और हरित क्षेत्रों पर कब्जे लगातार बढ़ रहे हैं। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने कई बार इस संबंध में सख्त निर्देश दिए हैं, फिर भी हालात में कोई बदलाव नहीं आया है।
इसकी एक बड़ी वजह यह है कि भोपाल में प्राकृतिक संपदा के संरक्षण की जिम्मेदारी किसी एक एजेंसी या विभाग के पास नहीं है, बल्कि यह बंटी हुई है। तालाबों की देखरेख नगर निगम करता है, जबकि कैचमेंट और मास्टर प्लान टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के पास हैं। सरकारी जमीन राजस्व विभाग के अधीन आती है और पर्यावरण तथा जल गुणवत्ता की जिम्मेदारी अलग-अलग एजेंसियों को सौंपी गई है। इन विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय की भी कमी है, जिसके परिणामस्वरूप अतिक्रमण होने पर कार्रवाई की जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती है।
दक्षिणी राज्यों की व्यवस्था और विशेषज्ञ की राय
इसके विपरीत, दक्षिण के राज्यों ने एकीकृत व्यवस्था और सख्त कानून बनाकर कार्रवाई को प्रभावी बनाया है। डॉ. एच.एम. मिश्रा, जो नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन गवर्नेंस एंड मैनेजमेंट के पूर्व निदेशक हैं, ने बताया कि भोपाल में भी एक एकीकृत प्राधिकरण की आवश्यकता है, जिसमें सभी संबंधित विभाग जुड़े हों।
एकीकृत प्राधिकरण की आवश्यकता
विशेषज्ञों के अनुसार, भोपाल में तालाबों, पहाड़ियों, हरित क्षेत्रों और प्राकृतिक जल निकासी तंत्र के संरक्षण के लिए एक एकीकृत प्राधिकरण का गठन किया जाना चाहिए। इस प्राधिकरण में नगर निगम, राजस्व, पुलिस, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग, पर्यावरण, वन विभाग और अन्य संबंधित एजेंसियों को साथ मिलकर काम करना चाहिए। इस प्राधिकरण को प्रकृति से संबंधित सभी मामलों में अधिकार देकर स्पष्ट रूप से जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वालों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान भी होना चाहिए।

