बुलंद सोच, सतना।
दो दशक पहले तक चित्रकूट-मझगवां-सरभंगा के बीहड़ जंगल ददुआ, ठोकिया और अन्य डकैत गिरोहों के खौफ के लिए जाने जाते थे, जहां बंदूकों की गूंज सुनाई देती थी। अब इन क्षेत्रों में बाघों की दहाड़ सुनाई दे रही है, जिससे तस्वीर बदल गई है। दस्यु उन्मूलन से पूर्व पन्ना के जंगलों से भटककर कभी-कभार कोई बाघ इन क्षेत्रों में आता था, लेकिन ठहर नहीं पाता था। डकैत गिरोहों के खात्मे के उपरांत वन विभाग की सक्रिय गश्त, शिकार पर नियंत्रण और संरक्षण के प्रयासों ने जंगल का माहौल परिवर्तित कर दिया है।
बाघों का नया बसेरा
पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघों की बढ़ती आबादी के कारण कई बाघों ने चित्रकूट-मझगवां के घने जंगलों को अपना नया घर बना लिया है। इन जंगलों में भरपूर शिकार, पर्याप्त जलस्रोत और सुरक्षित वन कारिडोर उपलब्ध हैं। वर्तमान में इस क्षेत्र में लगभग 20 बाघों की उपस्थिति दर्ज की गई है, और कई बाघिनों ने यहीं शावकों को जन्म दिया है।
बदलाव की शुरुआत
चित्रकूट-मझगवां-पाठा के जंगल 1970 के दशक से लेकर 2007-08 तक डकैतों के प्रमुख ठिकाने रहे। इस अवधि में ददुआ, ठोकिया, घनश्याम केवट, बबुली कोल सहित कई अन्य गिरोह चित्रकूट, सतना, बांदा और आसपास के जंगलों में सक्रिय थे। डकैतों की सक्रियता के कारण चित्रकूट, मझगवां और पाठा के जंगलों में बाघों के संरक्षण, बेहतर वन प्रबंधन और पौधारोपण जैसे कार्य नहीं हो पाते थे। यह बदलाव वर्ष 2009 के बाद शुरू हुआ, जब पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघ पुनर्स्थापना परियोजना सफल रही। पन्ना में बाघों की संख्या में तेजी से वृद्धि होने पर युवा बाघों ने नए क्षेत्रों की तलाश प्रारंभ की। पन्ना से सटे मझगवां, सरभंगा और धारकुंडी के जंगल उनके लिए प्राकृतिक गलियारे बन गए।
नए बाघ कारिडोर की योजना
राज्य सरकार भी प्रदेश में बाघों की बढ़ती संख्या को देखते हुए नए गलियारों (कारिडोर) को विकसित करने पर विचार कर रही है। हाल ही में बांधवगढ़ और संजय टाइगर रिजर्व से लेकर छत्तीसगढ़ के अचानकमार तक लगभग चार नए गलियारों के संबंध में बैठक आयोजित की जा चुकी है। पन्ना-सतना और उत्तर प्रदेश के रानीपुर टाइगर रिजर्व के बीच एक नया गलियारा तैयार करने पर भी विचार-विमर्श जारी है।
प्रमुख घटनाक्रम
1970 के दशक में चित्रकूट-पाठा-मझगवां क्षेत्र में डकैत गिरोहों का प्रभाव बढ़ा था। कुख्यात डकैत शिव कुमार पटेल उर्फ ददुआ 22 जुलाई 2007 को पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। 04 अगस्त 2008 को कुख्यात डकैत अंबिका प्रयास पटेल उर्फ ठोकिया के एनकाउंटर के बाद संगठित डकैत गिरोहों का तेजी से पतन हुआ। मझगवां-सरभंगा क्षेत्र में बाघों की स्थायी उपस्थिति 2015 के बाद से दर्ज होनी शुरू हुई। डिप्टी रेंजर राजेंद्र सिंह के अनुसार, डकैतों की मौजूदगी के कारण जंगलों में गश्त करने में कठिनाई होती थी। पन्ना में बाघों की संख्या बढ़ने के साथ ही बरौंधा और मझगवां रेंज में भी बाघों की संख्या बढ़ रही है।

