बुलंद सोच।

देश में दर्ज होने वाली हर चार मौतों में से केवल एक मौत का ही डॉक्टर द्वारा प्रमाणित मृत्यु प्रमाणपत्र बन पाता है। इसका अर्थ है कि चार में से तीन मौतों की वजह का कोई पुख्ता चिकित्सीय रिकॉर्ड दर्ज नहीं हो पाता है।
राज्यवार आंकड़ों के अनुसार, गोवा में दर्ज सभी मौतों का चिकित्सीय प्रमाणन होता है। वहीं, महाराष्ट्र में यह आंकड़ा 44% है, उत्तर प्रदेश में 6.7% और बिहार में केवल 3.6% मौतों का ही चिकित्सीय प्रमाणन हो पाता है।
नियम और प्रावधान
जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 के अनुसार, किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर डॉक्टर के लिए उसकी मृत्यु के कारण और संबंधित बीमारी का पूरा विवरण दर्ज करते हुए चिकित्सा मृत्यु प्रमाणपत्र निःशुल्क रजिस्ट्रार को उपलब्ध कराना अनिवार्य है।
यदि किसी व्यक्ति की मौत अस्पताल के बाहर होती है, लेकिन उसकी अंतिम बीमारी का इलाज किसी डॉक्टर ने किया था, तो उस डॉक्टर के लिए भी मृत्यु के कारण का चिकित्सा प्रमाणपत्र जारी करना आवश्यक होता है।
प्रमाणित मौतों के प्रमुख कारण
डॉक्टरों द्वारा प्रमाणित कुल मौतों में से 90.4% मौतों का कारण नौ प्रमुख बीमारियां हैं।
इनमें सबसे अधिक 38.8% मौतें हृदय और रक्त संचार तंत्र से जुड़ी बीमारियों के कारण हुईं। इसके बाद 11% मौतें श्वसन संबंधी बीमारियों, 8.3% संक्रामक और परजीवी रोगों, 5% कैंसर, 4.4% किडनी और मूत्र-जननांग संबंधी बीमारियों, 4.3% पाचन तंत्र के रोगों तथा 4% चोट या अन्य कारणों से दर्ज की गईं।
शेष 10.7% मौतें अन्य कारणों के अंतर्गत दर्ज की गईं।

