बुलंद सोच, ग्वालियर।
जिले में खरीफ की फसलों का बीमा कराने की अंतिम तिथि को 31 जुलाई से बढ़ाकर 17 अगस्त कर दिया गया है। यह निर्णय अधिक से अधिक किसानों को फसल बीमा का लाभ उठाने में सक्षम बनाने के उद्देश्य से लिया गया है।
ग्वालियर जिले में अब तक 42,700 किसानों ने अपनी खरीफ फसलों का बीमा कराया है, जो पिछले वर्ष के लगभग बराबर है। पिछले साल 42,000 किसानों ने फसलों का बीमा कराया था।
हालांकि, अंचल के किसान इस योजना में अपेक्षित रुचि नहीं दिखा रहे हैं। अऋणी किसानों की संख्या, जिन्होंने बैंक से कोई ऋण नहीं लिया है, विशेष रूप से चिंताजनक है।
अब तक केवल 90 अऋणी किसानों ने ही अपनी इच्छा से फसल बीमा कराया है। यह दर्शाता है कि अंचल में बीमा कराने में इन किसानों की रुचि कम है।
अंचल में जिन 42,610 किसानों ने बीमा कराया है, उन्होंने खेती के लिए सहकारी समितियों या बैंकों से खाद-बीज या अन्य कृषि कार्यों हेतु ऋण लिया है।
इन किसानों पर प्रशासन और संबंधित विभाग का दबाव रहता है, या दूसरे शब्दों में कहें तो खेती के लिए ऋण लेने की शर्त ही फसल का बीमा कराना होता है।
इसके विपरीत, जिन किसानों ने खेती के लिए सहकारी समितियों या बैंकों से ऋण नहीं लिया है, उनकी फसल बीमा कराने में किसी प्रकार की रुचि नहीं है।
यही कारण है कि अभी तक केवल 90 अऋणी किसानों ने ही अपनी खरीफ की फसलों का बीमा कराया है।
बीमा न कराने के मुख्य कारण
किसान फसल बीमा न कराने के पीछे प्रशासनिक और तकनीकी विसंगतियों को एक प्रमुख कारण बताते हैं। इन विसंगतियों के चलते प्रीमियम राशि जमा करने के बावजूद आपदा के समय किसानों को क्लेम का उचित लाभ नहीं मिल पाता है, कभी-कभी तो केवल 10 रुपये या 20 रुपये ही बीमा राशि मिलती है।
योजना में व्यक्तिगत खेत के बजाय पूरे पटवारी हल्के (ग्राम पंचायत) को एक बीमा इकाई माना जाता है। यदि किसी एक गांव के खेतों में प्राकृतिक आपदा से भारी नुकसान होता है, लेकिन बाकी हल्के में उत्पादन ठीक रहता है, तो प्रभावित किसान क्लेम से वंचित रह जाते हैं।
बाढ़, जलभराव या ओलावृष्टि जैसी स्थानीय आपदाओं में 72 घंटे के भीतर ऑनलाइन या ऐप पर सूचना देने की जटिल शर्त है। ग्रामीण अंचलों में सर्वर डाउन रहने, नेटवर्क समस्या और डिजिटल साक्षरता के अभाव में किसान समय पर शिकायत दर्ज नहीं करा पाते हैं।
फसल कटाई प्रयोगों में पारदर्शिता की कमी, बैंकों द्वारा फार्म भरते समय की जाने वाली गलत प्रविष्टियां और क्लेम भुगतान में महीनों की देरी से भी किसान परेशान हैं।
एक अन्य कारण यह है कि अधिकतर बड़े किसान अपनी खेती को दूसरे किसानों से ‘आध-बटाई’ या ‘ठेके पर खेत देना’ नामक पद्धति से कराते हैं। इस पद्धति से खेती करने वाले किसानों के नाम पर जमीन नहीं होती है।
ऐसे में यदि वे बीमा कराते हैं, तो नुकसान का क्लेम आध-बटाई या ठेके पर जमीन देने वाले किसान को मिलता है। यही वजह है कि ऐसे किसान फसल का बीमा नहीं कराते हैं।
फसल बीमा कंपनी के डिस्ट्रिक्ट मैनेजर अखिलेख गौतम ने बताया कि 31 जुलाई तक जिले भर में 42,700 किसानों ने अपनी फसल का बीमा कराया है, जिनमें से 90 किसान ऐसे हैं जिन्होंने कोई ऋण नहीं लिया है। उन्होंने यह भी पुष्टि की कि कंपनी ने फसल बीमा कराने की अंतिम तिथि 31 जुलाई से बढ़ाकर 17 अगस्त कर दी है, ताकि अधिक से अधिक किसान इस योजना का लाभ उठा सकें।

