बुलंद सोच, जबलपुर।

मध्य प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था के लिए 8 और 9 अगस्त को इंदौर में एक महत्वपूर्ण सम्मेलन आयोजित हो रहा है। इस सम्मेलन में सुप्रीम कोर्ट और देश के विभिन्न हाई कोर्ट के 50 से अधिक न्यायमूर्ति भाग ले रहे हैं। यह आयोजन न्याय व्यवस्था की चुनौतियों, न्यायिक सुधारों और भविष्य की रणनीति पर गंभीर मंथन का अवसर है।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में लंबित मुकदमों की स्थिति
हालांकि, इस महामंथन के बीच मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा है कि क्या केवल न्यायिक चिंतन से लंबित मुकदमों का पहाड़ कम होगा या इसके लिए अदालतों को पर्याप्त संख्या में न्यायाधीश भी मिलेंगे। 16 जुलाई 2026 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में लंबित मुकदमों का आंकड़ा लगभग 4.90 लाख तक पहुंच गया है। इन आंकड़ों के साथ, हाई कोर्ट देश के सर्वाधिक लंबित मामलों वाले न्यायालयों में शामिल है।
इन लंबित मामलों में से 24,938 मामले 20 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं, जिसका अर्थ है कि हजारों मुकदमों में न्याय की प्रतीक्षा ने एक पीढ़ी की उम्र पार कर ली है। देर से मिला न्याय कई बार न्याय की उपयोगिता को कमजोर कर देता है, जैसे संपत्ति विवाद में पीढ़ियां उलझ जाती हैं, सेवा विवाद में कर्मचारी सेवानिवृत्त हो जाते हैं और आपराधिक मामलों में आरोपी तथा पीड़ित दोनों वर्षों तक तारीखों के बीच फंसे रहते हैं।
न्यायाधीशों की कमी का मुद्दा
इसके समानांतर न्यायाधीशों की संख्या का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में न्यायाधीशों के 53 पद स्वीकृत हैं। 2026 में उपलब्ध सरकारी आंकड़ों पर आधारित एक रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 42 न्यायाधीश कार्यरत थे, यानी लगभग 11 पद खाली थे, जो कुल स्वीकृत पदों का लगभग पांचवां हिस्सा है।
अदालत से अपेक्षा की जाती है कि वह लंबित मामलों का बोझ घटाए, नए मामलों की बाढ़ संभाले, पुराने मुकदमों को प्राथमिकता दे, संवैधानिक और जटिल मामलों पर गहन सुनवाई करे तथा हर पक्ष को पर्याप्त सुनवाई का अवसर भी दे। हालांकि, जब न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या ही पूरी नहीं है, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि एक न्यायाधीश के कंधों पर न्यायिक व्यवस्था का कितना बोझ डाला जा सकता है।
सुधारों और भविष्य की रणनीति पर विचार
इंदौर में आयोजित यह सम्मेलन ऐतिहासिक हो सकता है, यदि चर्चा केवल तकनीक, एआई, ई-कोर्ट, केस मैनेजमेंट और न्यायिक सुधारों तक सीमित न रहकर न्यायाधीशों बनाम लंबित मुकदमों के वास्तविक अनुपात पर भी खुले मन से विचार करे। ई-फाइलिंग और डिजिटल तकनीक प्रक्रिया को तेज कर सकती है, परंतु अंतिम न्यायिक निर्णय के लिए प्रशिक्षित और पर्याप्त संख्या में न्यायाधीशों की आवश्यकता होती है।
इस मंथन में यह सवाल भी विचारणीय है कि क्या हर स्वीकृत पद को समयबद्ध तरीके से भरने की व्यवस्था बनाई जा सकती है, और क्या पुराने मुकदमों के लिए विशेष रणनीति, समयबद्ध सुनवाई व प्रभावी केस मैनेजमेंट लागू किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, क्या उन मामलों की अलग से निगरानी हो सकती है जो 10, 20 या उससे अधिक वर्षों से लंबित हैं।
न्यायपालिका को पर्याप्त बनाने की आवश्यकता
इस सम्मेलन से निकलने वाला सबसे बड़ा संदेश यह होना चाहिए कि न्यायपालिका को केवल आधुनिक ही नहीं, बल्कि पर्याप्त भी बनाना होगा। क्योंकि अदालत की इमारत कितनी भी भव्य हो, तकनीक कितनी भी आधुनिक हो और कानून कितना भी उत्कृष्ट हो, यदि न्याय करने वाले हाथ कम पड़ जाएं, तो न्याय की कतार लंबी होती चली जाएगी।
देश के शीर्ष न्यायमूर्तियों का यह मंथन ऐसे समय हो रहा है जब न्याय व्यवस्था के सामने मुकदमों का पहाड़, न्यायाधीशों की कमी और न्याय की बढ़ती अपेक्षाएं एक साथ खड़ी हैं। अब देश और प्रदेश की निगाहें इस पर हैं कि इस मंथन से मुकदमों के पहाड़ को काटने की कोई ठोस कार्ययोजना निकलती है या नहीं।

