बुलंद सोच।
देश के विभिन्न हिस्सों में नक्सलवाद के खात्मे के बाद अब सुरक्षा बलों का ध्यान सर्च अभियानों पर केंद्रित है। इसका कारण नक्सलियों द्वारा बड़े पैमाने पर जमीन में हजारों इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (आईईडी) दबाना है।
इन आईईडी में रिमोट कंट्रोल, कमांड व प्रेशर से संचालित होने वाली, इंफ्रारेड, मैग्नेटिक ट्रिगर्स, प्रेशर-सेंसिटिव बार्स या ट्रिप वायर की मदद से विस्फोट करने वाली डिवाइस शामिल हैं। इनमें बैटरी का उपयोग होता है।
बरसात में पानी भरने के कारण इन आईईडी की बैटरियां काम करना छोड़ देती हैं। विशेष रूप से, छत्तीसगढ़ और झारखंड के जंगलों में दबाई गई आईईडी की बैटरियां पानी एकत्रित होने या नमी के कारण करंट पास नहीं कर पा रही हैं।
नक्सलवाद से मुक्त हो चुके क्षेत्रों में जमीन के नीचे दबाए गए ये विस्फोटक पदार्थ अभी भी सुरक्षा बलों के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं हैं। खासतौर पर छत्तीसगढ़ और झारखंड में अभी तक आईईडी का खतरा बरकरार है।
पिछले दो वर्षों के दौरान नक्सलियों ने बड़े स्तर पर जमीन के नीचे बारूद लगाया था। उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वे सुरक्षा बलों के साथ आमने-सामने की लड़ाई करने में सक्षम नहीं थे, जिसके कारण नक्सलियों ने आवाजाही के कच्चे-पक्के रास्तों पर आईईडी दबा दी थीं। अब वही आईईडी एक बड़ा खतरा बनी हुई हैं।
नक्सलियों की पुरानी रणनीति
जब नक्सलवाद चरम पर था, तब नक्सली बरसात से पहले आईईडी विस्फोट में लगाई गई बैटरी को निकाल लेते थे। यदि किसी आईईडी को पांच-छह महीने तक ब्लास्ट नहीं किया जाता था, तो उस स्थिति में भी उसकी बैटरी बदलनी पड़ती थी।
वर्तमान स्थिति
अप्रैल के बाद से अधिकांश इलाके शांत हैं और सुरक्षा बल नियमित गश्त कर रहे हैं।

