BREAKING NEWS

ओबीसी आरक्षण खत्म कर सरकारी स्कूल छात्रों को नौकरी में प्राथमिकता दी जाए: वरिष्ठ अधिवक्ता

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, जबलपुर।

हाई कोर्ट में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण से जुड़े मामलों पर मंगलवार को 14वें दिन सुनवाई हुई। प्रशासनिक न्यायाधीश आनंद पाठक और न्यायमूर्ति विनय सराफ की विशेष युगलपीठ के समक्ष ओबीसी वर्ग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने विस्तृत बहस की।

सुनवाई के दौरान उन्होंने सुझाव दिया कि यदि आरक्षण से किसी वर्ग को परेशानी है, तो आरक्षण को समाप्त कर दिया जाए। इसके स्थान पर यह नियम बनाया जाए कि कक्षा एक से 12वीं तक सरकारी स्कूल में पढ़े छात्रों को ही सरकारी नौकरी में प्राथमिकता दी जाए।

Advertisement

वरिष्ठ अधिवक्ता ठाकुर ने तर्क दिया कि इस व्यवस्था से सभी वर्गों के लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाएंगे, जिससे शिक्षा व्यवस्था में समानता आएगी।

न्यायमूर्ति आनंद पाठक ने भी सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने अपने ग्वालियर कार्यकाल के दौरान शुरू की गई ‘विद्या दान’ पहल का उल्लेख किया।

इस पहल के तहत अधिकारी, आईआईटी से शिक्षित लोग और समाज के अन्य सदस्य सरकारी स्कूलों में जाकर बच्चों को पढ़ाते थे। उन्होंने बताया कि इंदौर के कलेक्टर सहित कई अधिकारी और शिक्षित लोग बच्चों को पढ़ाने पहुंचते थे, और जस्टिस शील नागू ने भी इस पहल में पढ़ाने की इच्छा जताई थी। कोरोना काल के कारण यह पहल बंद हो गई थी।

ओबीसी पक्ष ने कोर्ट को बताया कि तत्कालीन सरकार ने अगस्त 2019 में 27 प्रतिशत आरक्षण का कानून बनाया था। अक्टूबर 2019 में हाई कोर्ट में 555 पेज का जवाब दाखिल कर इसे उचित ठहराने का प्रयास किया गया था।

वरिष्ठ अधिवक्ता ठाकुर ने कहा कि इसी जवाब में सरकार ने ओबीसी की आबादी 51 प्रतिशत बताई थी। उन्होंने अलग से डेटा जुटाने की आवश्यकता पर सवाल उठाते हुए महाजन और मंडल आयोग की रिपोर्टों का हवाला दिया।

ठाकुर ने दलील दी कि ओबीसी की जातियों और उनकी सामाजिक स्थिति से संबंधित पर्याप्त सामग्री पहले से उपलब्ध है। महाजन आयोग की रिपोर्ट में प्रदेश की 92 ओबीसी जातियों का उल्लेख है, और क्रीमीलेयर के आधार पर नान-क्रीमीलेयर प्रमाणपत्र जारी करने की व्यवस्था पहले से मौजूद है। इसलिए, ओबीसी की पहचान के लिए अलग से डेडिकेटेड कमीशन या डेटा जुटाने की आवश्यकता नहीं है।

ठाकुर ने दावा किया कि 2019 से 2025 तक विभिन्न भर्तियों में 13 प्रतिशत ओबीसी और 13 प्रतिशत सामान्य वर्ग के पद रोके गए, जिससे लगभग 60-65 हजार अभ्यर्थी प्रभावित हुए हैं।

उन्होंने कोर्ट के समक्ष आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों की मेरिट और चयन प्रक्रिया में कथित विसंगतियों के उदाहरण भी प्रस्तुत किए। उनका कहना था कि कई ओबीसी अभ्यर्थी मेरिट में आने के बावजूद चयन प्रक्रिया में प्रभावित हुए।

ओबीसी पक्ष ने बहस के दौरान आरक्षण की आवश्यकता को आबादी के अनुपात और सामाजिक पिछड़ेपन से जोड़ते हुए अपनी दलीलें रखीं। वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने अंत में कोर्ट से वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को बरकरार रखने का आग्रह किया।

इस मामले में बुधवार, पांच अगस्त को अंतिम बहस होने की उम्मीद है।