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वेटरनरी विवि में तेंदुए के इलाज पर सवाल, 16 दांत टूटे

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, जबलपुर।

नरसिंहपुर जिले से रेस्क्यू कर ‘स्कूल ऑफ वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक एंड हेल्थ’ में लाई गई एक मादा तेंदुए के उपचार को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। संस्थान में तीन महीने तक चले इलाज के दौरान तेंदुए के 16 दांत टूट जाने का गंभीर आरोप लगा है।

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इन आरोपों के कारण अब वह मादा तेंदुआ न तो शिकार करने की स्थिति में है और न ही सामान्य रूप से भोजन कर पा रही है। कई विशेषज्ञों ने इलाज की प्रक्रिया पर एतराज जताते हुए वेटरनरी विश्वविद्यालय प्रशासन से लेकर वन विभाग के उच्च अधिकारियों तक शिकायत दर्ज कराई है।

कानूनी नोटिस और आरोप

एडवोकेट डॉ. दीपा कुलश्रेष्ठ ने संबंधित विभागों और जिम्मेदार अधिकारियों को एक कानूनी नोटिस भेजा है। नोटिस में कहा गया है कि मादा तेंदुए को ‘कैनाइन डिस्टेंपर डिजीज’ (CDV) के इलाज के लिए लाया गया था।

नोटिस के अनुसार, तेंदुए को प्राकृतिक माहौल के बजाय कंक्रीट की दीवारों, फर्श, ट्यूबलाइट और पंखों वाले कृत्रिम बाड़े में लंबे समय तक रखा गया, जिससे उसकी शारीरिक स्थिति बिगड़ी। तीन महीने की कैद के दौरान तेंदुआ एक बार बाड़े से बाहर निकल गया था, जिसे बाद में दोबारा पकड़ा गया।

लंबे समय तक इन परिस्थितियों में कैद रहने की वजह से तेंदुए के कैनाइन दांत टूट गए और घिस गए हैं।

एनिमल विशेषज्ञ मनीष कुलश्रेष्ठ ने आरोप लगाया है कि यह संस्थान ‘वेटरनरी काउंसिल ऑफ इंडिया’ (VCI) से पंजीकृत नहीं है। न ही इसकी लैब और उपकरणों को NABH की मान्यता प्राप्त है, इसके बावजूद यहां वन्यजीवों का इलाज और फॉरेंसिक प्रक्रियाएं की जा रही हैं।

मनीष कुलश्रेष्ठ ने यह भी आरोप लगाया है कि वन्यजीव रेस्क्यू का मुख्य उद्देश्य बीमार जीव का इलाज कर उसे जल्द से जल्द प्राकृतिक आवास में छोड़ना होता है, न कि उसे अनिश्चितकाल के लिए बाड़े में कैद रखना।

कानूनी नोटिस की प्रमुख मांगें

वेटरनरी विश्वविद्यालय को भेजे गए कानूनी नोटिस में मांग की गई है कि तेंदुए को 3 महीने से अधिक समय तक कैद में रखने की वैधानिक अनुमति और कानूनी आधार सार्वजनिक किया जाए। साथ ही, तेंदुए के टूटे हुए दांतों, समग्र स्वास्थ्य परीक्षण और व्यवहार निगरानी से जुड़े सभी दस्तावेज उपलब्ध कराए जाएं।

नोटिस में यह भी मांग की गई है कि स्वतंत्र पशु चिकित्सकों की टीम से इसकी जांच कराई जाए। इसके अतिरिक्त, तेंदुए के उपचार, पुनर्वास और प्रस्तावित रिहाई की पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच हो।

इसके अलावा, ‘वन्यजीव संरक्षण अधिनियम’, ‘राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण’ (NTCA) की गाइडलाइन और ‘पशु क्रूरता निवारण अधिनियम’ के संभावित उल्लंघनों की उच्च स्तरीय जांच की मांग भी की गई है।

विश्वविद्यालय प्रशासन का पक्ष

इस पूरे प्रकरण पर जबलपुर वेटरनरी विश्वविद्यालय की कुलसचिव डॉ. राखी वैश्य ने अपना पक्ष रखा है। उन्होंने कहा कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच के लिए एक विशेष कमेटी का गठन कर दिया गया है। समिति की जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद ही इस विषय पर आधिकारिक तौर पर कुछ कहा जा सकेगा।