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2026-08-06

सुप्रीम कोर्ट ने भोपाल अवैध निर्माण मामले में MP सरकार की जांच समिति पर लगाई रोक, हाईकोर्ट के स्टे आदेश भी रद्द

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, भोपाल।

राजधानी भोपाल में आवासीय भवनों के व्यावसायिक उपयोग और अवैध निर्माण के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सुनवाई की। इस सुनवाई में मध्य प्रदेश सरकार को बड़ा झटका लगा। कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा गठित 10 सदस्यीय जांच समिति की कार्रवाई पर रोक लगाने का निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को निर्धारित की गई है। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट से दुकान संचालकों को मिले सभी राहत आदेश (स्टे ऑर्डर) निरस्त कर दिए। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसके निर्देश पर चल रही जांच में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मध्य प्रदेश शासन की ओर से पेश अधिवक्ता को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के समानांतर किसी अन्य प्रक्रिया या जांच समिति के माध्यम से कार्रवाई प्रभावित नहीं की जा सकती।

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नगर निगम का पक्ष और कोर्ट का निर्देश

सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से अदालत को बताया गया कि निगम अवैध निर्माण और व्यावसायिक उपयोग के खिलाफ कार्रवाई करना चाहता है। हालांकि, विभिन्न स्तरों पर बाधाओं के कारण प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पा रही है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून के पालन में किसी प्रकार की ढिलाई स्वीकार नहीं की जाएगी।

संभावित आगामी कार्रवाई

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद यह माना जा रहा है कि राजधानी में आवासीय भूखंडों पर संचालित व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के खिलाफ नगर निगम की कार्रवाई फिर तेज होगी। कोर्ट ने साफ संकेत दिए कि अवैध निर्माण और भूमि उपयोग के उल्लंघन के मामलों में निर्धारित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई जारी रखी जाए।

मास्टर प्लान लागू करने की मांग

भोपाल के मास्टर प्लान को लागू करने की मांग को लेकर मध्य से कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने अपने समर्थकों के साथ धरना दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी शहर के सुव्यवस्थित विकास के लिए उसके मास्टर प्लान की आवश्यकता होती है। विधायक मसूद ने मध्य प्रदेश सरकार से जल्द से जल्द मास्टर प्लान लागू करने की अपील की, ताकि हर वर्ग को राहत मिल सके।

सरकार द्वारा समिति का गठन

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद भोपाल नगर निगम ने कई अवैध व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को नोटिस जारी कर सीलिंग की कार्रवाई शुरू की थी। इस कार्रवाई के विरोध के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई बैठक में पूरे मामले की समीक्षा के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की 10 सदस्यीय समिति गठित करने का निर्णय लिया गया था। इस समिति को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का अध्ययन कर रिपोर्ट देने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। समिति की रिपोर्ट आने तक व्यापारियों को राहत देने की बात भी कही गई थी।

रहवासी और व्यापारियों की प्रतिक्रिया

अवैध व्यावसायिक गतिविधियों के विरोध में अरेरा कॉलोनी, रोहित नगर, बावड़ियाकलां सहित कई क्षेत्रों के रहवासियों ने संयुक्त रहवासी संघर्ष समिति के बैनर तले प्रदर्शन और पैदल मार्च निकाला था। इन रहवासियों का कहना था कि आवासीय क्षेत्रों में लगातार बढ़ रही व्यावसायिक गतिविधियों से यातायात, पार्किंग और सुरक्षा संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं। वहीं दूसरी ओर, भोपाल चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज (बीसीसीआई) ने व्यापारियों के समर्थन में मिक्स लैंड यूज व्यवस्था लागू करने की मांग उठाई थी। संगठन का तर्क था कि वर्ष 2005 के बाद नया मास्टर प्लान लागू नहीं होने के कारण व्यापारियों को उनकी जरूरत के अनुरूप व्यावसायिक भूखंड उपलब्ध नहीं हो सके। इस स्थिति के कारण उन्हें मजबूरी में आवासीय परिसरों से व्यवसाय संचालित करना पड़ रहा था।

याचिकाकर्ता की आपत्ति

याचिकाकर्ता विवेक त्रिपाठी ने सुप्रीम कोर्ट में यह मुद्दा उठाया था कि नगर निगम ने जिन प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी, उनमें अपेक्षित कार्रवाई नहीं की गई। उन्होंने यह भी कहा कि बाद में कई सील प्रतिष्ठान दोबारा खुल गए। याचिकाकर्ता का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद कार्रवाई कमजोर पड़ गई, जिस पर अदालत ने सख्त रुख अपनाया।