बुलंद सोच, ग्वालियर।
मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की है कि केवल यह आशंका व्यक्त कर देने से कि कोई व्यक्ति अवैध हिरासत में है, बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती। न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता को प्रथमदृष्टया यह दिखाना होगा कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में किसी की अवैध हिरासत में है। इसी टिप्पणी के साथ हाई कोर्ट ने एक हैबियस कॉर्पस याचिका खारिज कर दी।
न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ के समक्ष रिंकू राजपूत की ओर से यह याचिका दायर की गई थी। याचिका में कहा गया था कि उसकी पत्नी लापता है।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा था कि गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराने के बावजूद पुलिस प्रभावी कार्रवाई नहीं कर रही है, इसलिए पत्नी को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कराने के निर्देश दिए जाएं।
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने याचिका और उसके साथ प्रस्तुत दस्तावेजों का परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने पुलिस अथवा मुख्यमंत्री हेल्पलाइन को दी गई किसी भी शिकायत में यह नहीं कहा था कि उसकी पत्नी किसी व्यक्ति की अवैध हिरासत में है। इस संबंध में कोई तथ्य या साक्ष्य भी पेश नहीं किए गए थे।
याचिका में केवल यह आशंका जताई गई थी कि पत्नी अवैध हिरासत में हो सकती है, लेकिन यह नहीं बताया गया था कि किस व्यक्ति ने उसे कथित रूप से बंधक बना रखा है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में यह नहीं माना जा सकता कि अवैध हिरासत का प्रथमदृष्टया मामला बनता है। इसलिए हैबियस कॉर्पस याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि त्वरित जांच और निष्पक्ष विवेचना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि पुलिस जांच में अनावश्यक देरी हो रही है, तो उसके लिए कानून में अलग वैधानिक व्यवस्था उपलब्ध है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में संबंधित व्यक्ति को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 528 के तहत सक्षम न्यायालय से त्वरित जांच के संबंध में राहत मांगनी चाहिए, न कि अनुच्छेद 226 के तहत हैबियस कॉर्पस याचिका दायर करनी चाहिए।

