बुलंद सोच, जबलपुर।
जबलपुर हाईकोर्ट में एक संज्ञान याचिका की सुनवाई के दौरान वन क्षेत्रों में सक्रिय शिकारियों और शरारती तत्वों के लोकेशन व मोबाइल डेटा उपलब्ध न कराए जाने का मुद्दा उठाया गया। इसी सुनवाई में कार्रवाई के दौरान वन अधिकारियों व कर्मचारियों की सुरक्षा का विषय भी सामने आया। कोर्ट मित्र ने हाईकोर्ट को बताया कि वन अधिकारियों और कर्मचारियों को हथियार दिए तो जाते हैं, लेकिन उनके इस्तेमाल पर इतनी पाबंदियां हैं कि जरूरत पड़ने पर भी वे उनका उपयोग करने से डरते हैं। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बी.पी. शर्मा की युगलपीठ ने उठाए गए इन मुद्दों को गंभीरता से लिया। युगलपीठ ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को अनावेदक बनाते हुए नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
बाओबाब पेड़ों से संबंधित जनहित याचिका
धार जिले में बाओबाब के पेड़ काटने, उनकी बिक्री और परिवहन से संबंधित प्रकाशित खबर का संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई जनहित याचिका के रूप में करने के आदेश दिए थे। याचिका की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य जैव विविधता बोर्ड को निर्देश दिया कि प्रदेश में स्थित बाओबाब के पेड़ों की तस्वीरों सहित स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए।
डेटा उपयोग की अनुमति का अभाव
कोर्ट मित्र अधिवक्ता अंशुमान सिंह ने युगलपीठ को अवगत कराया कि जांच के दौरान केंद्र सरकार के वन विभाग ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत वाइल्ड लाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो को मोबाइल स्टेटिक डेटा के उपयोग की अनुमति नहीं दी है। उन्होंने बताया कि अन्य जांच एजेंसियां मोबाइल स्टेटिक डेटा का उपयोग कर सकती हैं, जबकि वन विभाग को यह सुविधा नहीं मिलती। वन अपराधों पर प्रभावी रोक लगाने के लिए वन अधिकारियों और कर्मचारियों को शिकारियों या बदमाशों की सीडीआर (कॉल डिटेल रिकॉर्ड) और मोबाइल टावर की लाइव लोकेशन उपलब्ध नहीं कराई जाती। जांच के दौरान भी उन्हें यह जानकारी नहीं मिलती। अधिवक्ता अंशुमान सिंह ने कहा कि ऐसी सुविधा उपलब्ध होने से जांच अधिक प्रभावी हो सकती है और जंगलों व वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए बेहतर रोकथाम के उपाय किए जा सकते हैं।
खंडवा घटना का उल्लेख और सुरक्षा की मांग
कोर्ट मित्र अधिवक्ता ने पिछली सुनवाई के दौरान खंडवा में हुई एक घटना का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि वन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी अतिक्रमण हटाने गए थे, जिस दौरान अतिक्रमणकारियों ने उन पर धारदार हथियारों से हमला कर दिया। इस हमले में लगभग 40 कर्मचारी गंभीर रूप से घायल हो गए। अधिवक्ता ने बताया कि कर्मचारियों ने हथियारों का इस्तेमाल इसलिए नहीं किया, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि पुलिस उनके खिलाफ मामला दर्ज कर सकती है। उन्होंने मांग की कि वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों को सीआरपीसी की धारा 197 के तहत सुरक्षा प्रदान की जाए। अधिवक्ता ने यह भी मांग की कि यदि वे गैरकानूनी गतिविधियों को रोकने के लिए हथियार का इस्तेमाल करते हैं, तो उचित जांच के बाद ही उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई की जाए। उन्होंने बताया कि असम और ओडिशा ने इस संबंध में संशोधन भी किए हैं।
केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर समाधान निकालने के निर्देश
सरकार की ओर से युगलपीठ को बताया गया कि सीडीआर और टावर की लाइव लोकेशन का विषय केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र से संबंधित है। युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि पर्यावरण, वन और वन्यजीवों के संरक्षण के लिए सभी हितधारकों को एक साझा मंच पर आना चाहिए। खंडपीठ ने निर्देश दिया कि केंद्र और राज्य सरकार दोनों को उठाए गए मुद्दों पर सकारात्मक और ठोस समाधान निकालना चाहिए।

