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2026-07-31

जेसी मिल्स कर्मचारी दावे: हाईकोर्ट ने नए आवेदन खारिज किए, 4% ब्याज का आदेश

bulandsochnews Senior News Reporter

बुलंद सोच, ग्वालियर।

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने ‘जेसी मिल्स लिमिटेड’ के करीब 29 सालों से लंबित परिसमापन मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। जस्टिस आशीष श्रोती की एकलपीठ ने मजदूर कांग्रेस द्वारा दायर तीन अंतरिम आवेदनों का निपटारा करते हुए 7,839 पूर्व कर्मचारियों के उन दावों को दोबारा स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिनका निपटारा पहले ही किया जा चुका था।

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हालांकि, अदालत ने कर्मचारियों को कंपनी बंद होने की तारीख से लेकर 4 मई 1998 (कंपनी के परिसमापन आदेश की तारीख) तक की बकाया राशि पर 4 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का निर्देश भी दिया है।

त्रिवेदी समिति की रिपोर्ट और भुगतान

सुनवाई के दौरान अदालत ने याद दिलाया कि वर्ष 2009 में डिस्ट्रिक्ट रिटायर्ड जज एस.एस. त्रिवेदी की अध्यक्षता में गठित समिति ने 7,839 पूर्व कर्मचारियों के दावों की गहन जांच की थी।

इस समिति ने 102.36 करोड़ रुपए से अधिक की राशि को भुगतान योग्य माना था। हाईकोर्ट ने 15 अप्रैल 2009 को इस रिपोर्ट को स्वीकृति दी थी, जिसके आधार पर कर्मचारियों को समय-समय पर उनके हक का भुगतान किया गया।

बगले समिति का कार्यक्षेत्र

मामले में तब एक नया मोड़ आया जब बाद में ऐसे कुछ कर्मचारियों और लेनदारों के नाम सामने आए, जिनके दावों का परीक्षण 2009 में नहीं हो पाया था। इन छूटे हुए मामलों के निपटारे के लिए वर्ष 2024 में ‘वी. बगले एंड कंपनी’ की एक समिति का गठन किया गया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि बगले समिति का कार्य केवल उन छूटे हुए कर्मचारियों और अन्य लेनदारों के दावों का सत्यापन करना था, जिनका पहले हिसाब नहीं हुआ था।

मजदूर कांग्रेस की दलील और कोर्ट का रुख

मजदूर कांग्रेस ने अपनी याचिका में तर्क दिया था कि त्रिवेदी समिति ने नोटिस पे, बोनस, लीव एनकैशमेंट, एलटीए, पीएफ और अन्य मदों पर उचित विचार नहीं किया था। उनके अनुसार, लगभग 188.88 करोड़ रुपए के अतिरिक्त दावे बगले समिति के समक्ष प्रस्तुत नहीं किए गए थे।

हाईकोर्ट ने मजदूर कांग्रेस की इस दलील को तथ्यात्मक रूप से गलत बताया। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि त्रिवेदी समिति पहले ही इन सभी दावों पर गहराई से विचार कर चुकी थी और नोटिस पे, बोनस, लीव पे तथा यात्रा भत्ते जैसे दावों को ठोस कारणों के साथ खारिज कर चुकी थी।

अदालत ने यह भी दोहराया कि एक ही मामले को बार-बार नए सिरे से नहीं खोला जा सकता है।